छत्तीसगढ़ में नवरात्रि के गरबा से शुरू हुई एक बहस अब भारतीय दर्शन, पंथ परंपराओं और ‘सनातन के अपमान’ के आरोप तक पहुंच गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मूर्ति पूजा को लेकर जो सवाल उठाए, उन्हें भाजपा ने धर्म पर हमला बताया है, जबकि बघेल का तर्क है कि वे भारत की विविध धार्मिक परंपराओं की याद दिला रहे थे। यह विवाद समझने के लिए इसकी शुरुआत तक जाना ज़रूरी है।
शुरुआत: संस्कृति मंत्री का गरबा पर बयान
अक्टूबर की शुरुआत में राज्य के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने गरबा-डांडिया आयोजनों पर बयान दिया था। अमर उजाला और पत्रिका के मुताबिक अंबिकापुर में मीडिया से बातचीत में उन्होंने छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सलीम राज के बयान का समर्थन किया और कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लोग पूजा में हिस्सा नहीं लेते, तो उन्हें ऐसे आयोजनों से दूरी बनानी चाहिए। पत्रिका के अनुसार उन्होंने कहा, “जो मां की आराधना नहीं करता है, हमारे धर्म को नहीं मानता है, उसे गरबा में नहीं जाना चाहिए।”
मंत्री ने यह भी कहा था कि कुछ लोग नाम बदलकर ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचते हैं और ऐसे लोगों की पहचान कर FIR होनी चाहिए। उसी समय कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री शिव डहरिया ने News Inc India के अनुसार भाजपा पर त्योहार को भी बांटने का आरोप लगाया था और पूछा था कि क्या सभी हिंदू भी अपनी मां-बहनों के साथ ही गरबा में जाते हैं।
बघेल का तर्क: ‘पहले भारत को समझें’
इसी बयान पर भूपेश बघेल ने अपनी प्रतिक्रिया दी, जो बाद में विवाद की धुरी बन गई। विस्तार न्यूज़ के मुताबिक बघेल ने कहा कि मंत्री भारतीय दर्शन को नहीं समझते। उन्होंने पूछा कि कबीर पंथ में कौन-सी मूर्ति पूजा होती है, सिख धर्म में कौन-सी मूर्ति पूजा है और सतनाम पंथ में कहां मूर्ति पूजा है। बघेल ने कहा कि भारत में बहुत सारे पंथ हैं जिनमें गुरु परंपरा है और उनमें मूर्ति पूजा नहीं है, इसलिए पहले भारत को समझें, फिर बात करें।
बघेल का यह जवाब राजनीतिक रूप से सोचा-समझा भी दिखता है। छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ और सतनाम पंथ के अनुयायियों की बड़ी संख्या है। गुरु घासीदास की सतनाम परंपरा राज्य के अनुसूचित जाति समाज की पहचान से गहराई से जुड़ी है, और कबीरपंथी समाज भी कई ज़िलों में प्रभावशाली है। यानी बघेल ने मंत्री की कसौटी को इन समुदायों के सामने रखकर यह सवाल खड़ा किया कि क्या ‘मूर्ति पूजा’ को धार्मिक पहचान की शर्त बनाया जा सकता है।
वीडियो स्रोत: CG Swaraj (YouTube) | मूल वीडियो देखें
भाजपा का हमला: ‘सनातन का अपमान’
भाजपा ने बघेल के जवाब को दूसरे अर्थ में पढ़ा। 18 अक्टूबर को @BJP4CGState हैंडल से बघेल का वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा गया:
भूपेश ने आखिर सनातन का अपमान क्यों किया, जानने के लिए वीडियो अंत तक देखें…
BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState), 18 अक्टूबर 2026
विस्तार न्यूज़ के मुताबिक भाजपा नेता पुरंदर मिश्रा ने भी पलटवार किया। उन्होंने कहा कि भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ की संस्कृति के शुभचिंतक हैं और ऐसा बयान उन्हें शोभा नहीं देता। मिश्रा ने मूर्ति पूजा न मानने वाले बयान को बेतुका बताया और कहा कि छत्तीसगढ़ के सारे लोग मूर्ति पूजा के समर्थक हैं।
‘शीशे के घर’ वाला पोस्टर: दूसरा मोर्चा
अगले ही दिन, 19 अक्टूबर को भाजपा ने बघेल पर एक और पोस्टर हमला किया, हालांकि DW Hindi की रिपोर्ट के मुताबिक यह पोस्टर बघेल के उस बयान के बाद आया था जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल के कार्यकाल, नोटबंदी, GST, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए थे। पोस्टर में बघेल को कांच की इमारत के सामने दिखाया गया, जिस पर कोयला घोटाले और CGPSC घोटाले के पत्थर टकराते दिखे। साथ में लिखा था:
शीशे के घर में रहकर, पत्थर उछाले जा रहे हैं, भूपेश जी अपने ही कार्यकाल के सवाल, क्यों भुलाए जा रहे हैं?
BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState), 19 अक्टूबर 2026
दोनों पोस्ट को साथ पढ़ें तो भाजपा की रणनीति साफ दिखती है: एक तरफ आस्था के सवाल पर बघेल को घेरना, दूसरी तरफ उनके कार्यकाल के कथित घोटालों की याद दिलाकर उनके हमलों की धार कुंद करना। कोयला परिवहन से जुड़ी कथित अवैध वसूली और CGPSC भर्ती विवाद दोनों मामलों में जांच चल रही है, और भाजपा इन्हें बार-बार राजनीतिक बहस के केंद्र में लाती रही है।
असल बहस किस बात की है
इस पूरे विवाद में दो अलग सवाल आपस में उलझ गए हैं। पहला सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होने के लिए मूर्ति पूजा या किसी खास आस्था की शर्त रखी जा सकती है, जो मंत्री के बयान से उठा। दूसरा सवाल यह है कि क्या बघेल का तर्क मूर्ति पूजा पर टिप्पणी है या धार्मिक विविधता की याद दिलाना। भाजपा पहले अर्थ पर ज़ोर दे रही है, कांग्रेस दूसरे पर।
सनातन परंपरा के भीतर भी सगुण और निर्गुण दोनों धाराएं रही हैं। कबीर जैसे संतों ने निर्गुण भक्ति की बात की, और आज भी भारत की कई परंपराएं मूर्ति के बजाय गुरु, नाम या ग्रंथ को केंद्र में रखती हैं। यही वजह है कि यह बहस सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं, बल्कि इस पर है कि धार्मिक पहचान को कौन, किस पैमाने पर परिभाषित करेगा। ‘शीशे के घर’ पोस्टर पर बघेल या कांग्रेस की ओर से अलग से कोई जवाब इस खबर के लिखे जाने तक सामने नहीं आया है, यानी जवाब का इंतज़ार है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: विस्तार न्यूज़, DW Hindi, अमर उजाला, पत्रिका, News Inc India, CG Swaraj (YouTube)।

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