गांव में मुनादी करनी हो, किसी की मौत या जन्म की सूचना थाने तक पहुंचानी हो, या राजस्व विभाग का कोई काम हो, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में सबसे पहले जिसे याद किया जाता है, वह है कोटवार। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को यही कोटवार अपनी मांगों के साथ खुद जिला मुख्यालयों पर बैठे दिखे। कोटवार धरना कोटवार एसोसिएशन ऑफ छत्तीसगढ़ के आह्वान पर हुआ और जगह-जगह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नाम ज्ञापन सौंपे गए।
लल्लूराम, न्यायधानी न्यूज़ और खबर छत्तीसगढ़ की रिपोर्ट्स के मुताबिक एसोसिएशन ने प्रदेश के करीब 16 हजार कोटवारों के इस आंदोलन में शामिल होने की बात कही थी। लल्लूराम के अनुसार नवा रायपुर के तूता धरना स्थल सहित सभी जिला मुख्यालयों पर कोटवारों के जुटने का कार्यक्रम था।
चार मांगें, जो ज्ञापन में लिखी गईं
एसोसिएशन के ज्ञापन और जिलों से आई रिपोर्ट्स के आधार पर कोटवारों की चार प्रमुख मांगें ये हैं:
- नियमितीकरण और संविलियन: सभी कोटवारों को नियमित कर राजस्व विभाग में संविलियन किया जाए, ताकि बीमा, पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं मिल सकें।
- न्यूनतम 15 हजार रुपये मासिक: महंगाई को देखते हुए पारिश्रमिक बढ़ाकर कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह किया जाए और सभी कोटवारों को एक ही वर्ग में रखा जाए।
- वंशानुगत नियुक्ति: कोटवार पद पर गैर-वंशज व्यक्तियों की नियुक्ति पर रोक लगे और पूर्व प्रचलित व्यवस्था के अनुसार कोटवार परिवार के पात्र सदस्यों को ही नियुक्ति मिले।
- शहरी क्षेत्रों में नियुक्ति पर रोक हटे: नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम क्षेत्रों में कोटवारों की नियुक्ति पर लगा प्रतिबंध हटाया जाए।
जिलों से तस्वीर: जांजगीर-चांपा से धमतरी तक
दैनिक भास्कर के मुताबिक जांजगीर-चांपा में कोटवारों ने एक दिवसीय धरना देकर मुख्यमंत्री के नाम एसडीएम को ज्ञापन सौंपा। वहां कोटवारों ने कहा कि वे लंबे समय से ग्रामीण स्तर पर शासन और जनता के बीच कड़ी का काम कर रहे हैं, फिर भी उन्हें नियमित शासकीय कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला। उन्होंने यह भी बताया कि ग्रामीण इलाके नगरीय निकायों में शामिल होने के बाद मृत्यु, त्यागपत्र या सेवानिवृत्ति से खाली हुए पदों पर नई नियुक्तियां नहीं हो रही हैं।
धमतरी में कोटवारों ने गांधी मैदान में धरना देकर नारेबाज़ी की। भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक वहां कोटवारों ने कहा कि मौजूदा महंगाई में 3 से 5 हजार रुपये मासिक पारिश्रमिक से गुज़ारा मुश्किल है। संगठन ने यह आरोप भी लगाया कि नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था के कारण कई परिवारों को परेशानी होती है और कुछ मामलों में अदालत तक जाना पड़ता है। बेमेतरा में हुए प्रदर्शन का वीडियो NDTV MP Chhattisgarh ने जारी किया है।
वीडियो स्रोत: NDTV MP Chhattisgarh (YouTube) | मूल वीडियो देखें
यह दूसरा चरण है, पहला जुलाई में हुआ था
यह आंदोलन अचानक नहीं हुआ। लल्लूराम के मुताबिक संघ के प्रांताध्यक्ष प्रेमकिशोर बाघ, प्रांतीय सचिव नागेश्वर सिंह चौहान और मीडिया प्रभारी गिरिवरदास मानिकपुरी ने बताया था कि यह आंदोलन का दूसरा चरण है। पहले चरण में 3 जुलाई 2026 को तहसील स्तर पर धरना देकर तहसीलदारों के माध्यम से ज्ञापन सौंपा गया था। संगठन का कहना है कि तीन महीने बाद भी शासन ने कोटवारों के हित में कोई फैसला नहीं लिया, इसलिए दूसरा चरण करना पड़ा।
खबर छत्तीसगढ़ के अनुसार 9 अक्टूबर को प्रांतीय संघर्ष समिति की बैठक में 23 अक्टूबर को जिला स्तर पर धरने का फैसला हुआ था। आरंग तहसील शाखा ने तो उस दिन सभी कोटवारों के सामूहिक अवकाश पर रहने की सूचना भी प्रशासन को दी थी। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आंदोलन के दिन गांवों में कोटवारों से जुड़े रोज़मर्रा के काम पर असर पड़ा।
कोटवार कौन हैं और उनकी स्थिति इतनी उलझी क्यों है
कोटवार व्यवस्था छत्तीसगढ़ और मध्य भारत की पुरानी ग्राम प्रशासन परंपरा से निकली है। कोटवार गांव स्तर पर राजस्व और पुलिस प्रशासन की आंख-कान माने जाते हैं: जन्म-मृत्यु की सूचना, अपराध या दुर्घटना की खबर थाने तक पहुंचाना, सरकारी आदेशों की मुनादी और योजनाओं की जानकारी गांव तक पहुंचाना उनकी ज़िम्मेदारी में आता है। परंपरागत रूप से यह पद अक्सर एक ही परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा है, और इसी वजह से वंशानुगत नियुक्ति की मांग भावनात्मक मुद्दा भी है।
दिक्कत यह है कि कोटवार न पूरी तरह सरकारी कर्मचारी हैं, न पूरी तरह स्वतंत्र। उन्हें पारिश्रमिक मिलता है, लेकिन नियमित वेतनमान, पेंशन या ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं नहीं। जब गांव शहरी निकायों में मिल जाते हैं, तो पद ही अनिश्चितता में चला जाता है। यही अधूरापन इस आंदोलन की जड़ है।
सरकार की ओर से अब तक क्या
ज्ञापन मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नाम सौंपे गए हैं, लेकिन इन मांगों पर राज्य सरकार या राजस्व विभाग की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया इस खबर के लिखे जाने तक सामने नहीं आई है। यानी सरकार के जवाब का इंतज़ार है। 15 हजार रुपये मासिक पारिश्रमिक और नियमितीकरण जैसी मांगों का वित्तीय बोझ बड़ा हो सकता है, इसलिए सरकार का रुख बजट और प्रशासनिक ढांचे दोनों से तय होगा।
फिलहाल इतना साफ है कि जो लोग बरसों से सरकार की बात गांव-गांव तक पहुंचाते रहे हैं, वे अब चाहते हैं कि उनकी बात भी उतनी ही गंभीरता से सरकार तक पहुंचे। तहसील से जिला स्तर तक पहुंचा यह आंदोलन बताता है कि संगठन दबाव बनाए रखने के मूड में है। TimeTrolls इस पर नज़र रखेगा कि सरकार कोई समिति, बातचीत या घोषणा करती है या नहीं।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: दैनिक भास्कर (जांजगीर-चांपा), दैनिक भास्कर (धमतरी), लल्लूराम, न्यायधानी न्यूज़, खबर छत्तीसगढ़, NDTV MP Chhattisgarh (YouTube)।

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