बस्तर दशहरा अपनी 75 दिनों की लंबी अवधि और अनोखे विधानों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। लेकिन इस साल यह पर्व एक असहज सवाल के साथ आगे बढ़ रहा है: जब परंपरा और प्रोटोकॉल आमने-सामने हों, तो किसे रास्ता देना चाहिए? जगदलपुर में जोगी विधान निभाने वाले नाग परिवार को सिरहासर भवन से हटाए जाने की खबर ने यही बहस छेड़ दी है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को प्रशासन ने बस्तर दशहरा में अहम विधान निभाने वाले जोगी दौलत नाग और उनके परिवार को सिरहासर भवन से हटा दिया। वजह बताई गई कि शुक्रवार को इसी भवन में मुरिया दरबार लगना है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के शामिल होने का कार्यक्रम है, और उससे पहले भवन की सफाई और तैयारी होनी है।
परिवार का आरोप: न सूचना, न नोटिस
नाग परिवार का कहना है कि उन्हें प्रशासन की ओर से पहले से कोई सूचना या नोटिस नहीं दिया गया था। दौलत नाग ने भास्कर को बताया कि जब उन्होंने हटाए जाने का कारण पूछा, तो मौके पर मौजूद अधिकारियों ने राष्ट्रपति के आगमन और मुरिया दरबार की तैयारी का हवाला दिया। परिवार की नाराज़गी इस बात पर है कि देवी-देवताओं की विदाई और परंपरागत रस्में पूरी होने से पहले ही उन्हें भवन छोड़ना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार इसी कारण परिवार बाहर रैनी की रस्म में शामिल नहीं हो सका और पूर्व राजपरिवार के साथ होने वाले पारंपरिक नवाखानी विधान में भी उसकी भागीदारी छूट गई। परिवार के साथ आए ग्रामीण अपने आंगा और देवी-देवताओं को दशहरा के मुख्य विधानों में शामिल नहीं करा सके। सामान गाड़ी में लादकर गांव लौटते परिवार की तस्वीर इस पूरे प्रसंग की सबसे चुभने वाली छवि बन गई है।
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प्रशासन का पक्ष: ‘अपने मन से लौटे’
इस आरोप पर प्रशासन की राय बिल्कुल अलग है। जगदलपुर तहसीलदार राहुल गुप्ता ने भास्कर से कहा कि जोगी और उनका परिवार अपने मन से वहां से लौटा है और जाते वक्त विदाई की रस्म भी प्रशासन ने पूरी की। यानी प्रशासन के मुताबिक यह ज़बरन बेदखली नहीं, बल्कि सहमति से हुई विदाई थी।
दोनों दावों के बीच का फासला ही इस विवाद की असली जड़ है। परिवार कहता है कि उसे बिना सूचना हटाया गया, जबकि प्रशासन कहता है कि वह अपनी मर्ज़ी से गया। किसी लिखित आदेश या नोटिस की प्रति अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, जिससे यह तय हो सके कि भवन खाली कराने का फैसला किस स्तर पर और कब लिया गया।
जोगी विधान क्यों मायने रखता है
बाहर से देखने वालों के लिए यह सिर्फ एक कमरे को खाली कराने का मामला लग सकता है, लेकिन बस्तर दशहरा के भीतर जोगी विधान की जगह बेहद खास है। परंपरा के मुताबिक जोगी नौ दिनों तक उपवास रखकर कठिन तपस्या करता है और यह तपस्या सिरहासर भवन में ही होती है। मान्यता है कि जोगी की यह साधना पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने के लिए की जाती है। भास्कर की रिपोर्ट इसे करीब 600 साल पुरानी परंपरा बताती है।
इस परंपरा की एक निजी कीमत भी है। दौलत नाग के मुताबिक जोगी विधान से जुड़े रहने की वजह से उनके परिवार को अब तक उनकी मूल जाति हल्बा में औपचारिक रूप से शामिल नहीं किया गया है। यानी जिस परंपरा के लिए परिवार ने सामाजिक दंश झेला, उसी परंपरा के अंतिम चरण में उसे जगह छोड़नी पड़ी। यही विडंबना स्थानीय लोगों की नाराज़गी को और गहरा कर रही है।
रथ, JCB और बल प्रयोग: एक के बाद एक तकरार
जोगी परिवार का मामला इस साल के दशहरे में अकेला विवाद नहीं है। भास्कर के मुताबिक इससे दो दिन पहले परिक्रमा के दौरान रथ का पहिया टूट गया था, जिसके बाद प्रशासन ने जेसीबी से रथ खिंचवाया। आदिवासियों ने इसे परंपराओं के विरुद्ध बताकर विरोध किया और रिपोर्ट के अनुसार इसके बाद उन्हीं पर बल प्रयोग किया गया। बस्तर दशहरा का रथ परंपरागत रूप से ग्रामीण अपने हाथों से खींचते हैं, इसलिए मशीन का इस्तेमाल कई लोगों को आस्था में दखल जैसा लगा।
इन घटनाओं को साथ रखकर देखें तो एक पैटर्न उभरता है। प्रशासन की प्राथमिकता सुरक्षा, समय-सारिणी और वीवीआईपी दौरे की तैयारी है, जबकि ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के लिए हर विधान का अपना क्रम और अपनी पवित्रता है। जब दोनों प्राथमिकताओं के बीच बातचीत कमज़ोर पड़ती है, तो छोटी-सी प्रशासनिक कार्रवाई भी परंपरा के अपमान के रूप में देखी जाने लगती है।
आगे के विधानों पर संशय
बस्तर दशहरा अभी खत्म नहीं हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार बाहर रैनी, काछन जात्रा, कुटुंब जात्रा और मां दंतेश्वरी की विदाई जैसे अंतिम विधान बाकी हैं। दौलत नाग ने आशंका जताई है कि वे आगे के विधानों में शामिल हो पाएंगे या नहीं, इसे लेकर असमंजस बना हुआ है।
राष्ट्रपति का दौरा किसी भी आयोजन के लिए सम्मान की बात होता है, और मुरिया दरबार जैसे लोकतांत्रिक मंच पर देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति की मौजूदगी अपने आप में प्रतीकात्मक है। लेकिन इसी प्रतीक के बीच अगर एक आदिवासी परिवार यह महसूस करे कि उसकी सदियों पुरानी भूमिका को किनारे कर दिया गया, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि तैयारियों में परंपरा के संरक्षकों से कितनी बात की गई।
अब निगाहें इस पर हैं कि क्या ज़िला प्रशासन या दशहरा समिति नाग परिवार को बाकी विधानों में ससम्मान वापस बुलाती है, और क्या भविष्य के आयोजनों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था बनती है जिसमें प्रोटोकॉल और परंपरा दोनों को जगह मिल सके। TimeTrolls इस मामले पर नज़र रखे हुए है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: दैनिक भास्कर, असली आवाज़ (YouTube)।







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