राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर दौरा छत्तीसगढ़ के लिए बड़ा मौका माना जा रहा था। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति पहली बार ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल होने वाली थीं। लेकिन दौरे से ठीक पहले बहस विकास या परंपरा पर कम और एक शब्द पर ज़्यादा टिक गई। वह शब्द है ‘मुखौटा’, जिसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इस्तेमाल किया और जिसे भाजपा ने राष्ट्रपति और आदिवासी समाज के अपमान का मुद्दा बना दिया।
यह विवाद अकेला नहीं है। इसी हफ्ते बस्तर दशहरा के विजय रथ की चपेट में आकर एक ग्रामीण की मौत हुई, और बैज ने इसके लिए भी शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया। इससे पहले मुरिया दरबार के न्योते और जोगी परिवार के मुद्दे पर भी तकरार हो चुकी है। यानी सदियों पुराने इस पर्व के आसपास इस बार सियासत की कई परतें एक साथ खुल रही हैं।
बैज ने आखिर कहा क्या था
ETV भारत की रिपोर्ट के मुताबिक बैज ने 22 अक्टूबर को राष्ट्रपति के दौरे को फिजूलखर्ची से जोड़ा। उन्होंने पूछा, “राष्ट्रपति जी तो दंतेवाड़ा भी आए थे, क्या फायदा हुआ? कुछ फायदा हुआ बस्तर की जनता को? कुछ नहीं हुआ।” उनका दावा था कि बस्तर पंडुम का 6 करोड़ 50 लाख का बिल बस्तर की जनता की गाढ़ी कमाई से भरा गया।
राष्ट्रपति को सिर्फ एक मुखौटा बनाकर लाया जा रहा है ताकि फिर से बस्तर पंडुम जैसे राष्ट्रपति के नाम से करोड़ों का टेंडर लगा लें… राष्ट्रपति जी आएं वेलकम हैं, लेकिन उनके आने से बस्तर को कोई फायदा नहीं होना है।
दीपक बैज, PCC अध्यक्ष (ETV भारत के अनुसार)
बयान को ध्यान से पढ़ें तो बैज का निशाना राष्ट्रपति के बजाय आयोजन पर होने वाले खर्च और टेंडर पर दिखता है। वे टेंडर में गड़बड़ी की आशंका जताते हैं और यह भी कहते हैं कि राष्ट्रपति का स्वागत है। लेकिन राजनीति में शब्दों का चुनाव अक्सर पूरे तर्क पर भारी पड़ जाता है। ‘मुखौटा’ शब्द सर्वोच्च संवैधानिक पद के साथ जुड़ते ही बहस का केंद्र बदल गया। यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि टेंडर में घोटाले की बात अभी सिर्फ आरोप है। इसके समर्थन में कोई दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
भाजपा का जवाब: तीन मंत्री और एक प्रवक्ता
भाजपा ने इस बयान पर एक के बाद एक पलटवार किए। वन मंत्री केदार कश्यप ने ETV भारत से कहा कि कांग्रेस की यह पुरानी आदत रही है कि वह संविधान के सर्वोच्च पद पर बैठीं राष्ट्रपति का अपमान करे। उन्होंने मुरिया दरबार को बस्तर की सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक बताया और कहा कि इसकी परंपरा लगभग 500 से 600 साल पुरानी है। हरिभूमि की रिपोर्ट में कश्यप ने बैज के बयान को “केवल राजनीतिक हताशा नहीं, बल्कि बस्तर के जनजातीय समाज, उसकी संस्कृति, परंपराओं और अस्मिता का खुला अपमान” कहा।
IBC24 के मुताबिक मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि बैज खुद जनजातीय समाज से आते हैं, इसलिए उन्हें जनजातीय समाज से आने वाली राष्ट्रपति के लिए ‘मुखौटा’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जायसवाल ने यह भी आरोप लगाया कि बस्तर की विकास यात्रा कांग्रेस को खटक रही है।
23 अक्टूबर को भाजपा प्रदेश प्रवक्ता देवलाल ठाकुर ने हमला और तेज़ किया। RNS के अनुसार उन्होंने पूछा कि भारत की परंपरा ‘अतिथि देवो भव:’ की रही है, तो कांग्रेस और बैज इसे स्वीकार करने से क्यों कतराते हैं। ठाकुर ने मांग की कि कांग्रेस नेतृत्व इस बयान के लिए जनता से बिना शर्त माफी मांगे। उसी दिन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी ETV भारत से बातचीत में कांग्रेस पर जनजातीय समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और पूछा कि 55 से 60 साल के शासन में उसने जनजातीय समाज के लिए क्या किया।
रथ हादसा: बहस का दूसरा, ज़्यादा गंभीर सिरा
‘मुखौटा’ पर जुबानी जंग के बीच एक दुखद घटना ने सवालों को और गहरा कर दिया। नईदुनिया के मुताबिक 21 अक्टूबर की रात भीतर रैनी रस्म के दौरान विजय रथ खींचते समय दो ग्रामीण रथ की चपेट में आ गए। एक की मौके पर मौत हो गई और दूसरे का पैर कट गया। महारानी अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. संजय प्रसाद ने इसकी पुष्टि की। घायल का इलाज महारानी अस्पताल में चल रहा है। मृतक के नाम की वर्तनी अलग-अलग रिपोर्टों में अलग छपी है, इसलिए हम यहां नाम नहीं दोहरा रहे।
लल्लूराम के मुताबिक यह इस साल का पहला हादसा नहीं था। 16 अक्टूबर को फूल रथ बिजली के खंभे से टकराया था, जिसमें करीब एक दर्जन लोग घायल हुए। 18 अक्टूबर को फूल रथ निर्माणाधीन विजय रथ से टकराया और उसका अगला पहिया टूट गया। इसके बाद पुलिस और रथ खींचने वाले ग्रामीणों के बीच विवाद हुआ, और जेसीबी व क्रेन की मदद से परिक्रमा पूरी कराई गई।
वीडियो स्रोत: The Lens (YouTube) | मूल वीडियो देखें
The Lens से बातचीत में बैज ने इसे “बड़ा गंभीर मामला” बताया और कहा कि इसमें शासन और प्रशासन की लापरवाही है। उन्होंने मांग की कि मृतक के परिवार को कम से कम 50 लाख और घायल को कम से कम 25 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। उनका कहना था, “परंपराओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।” बैज खुद बस्तर से आते हैं, और पर्व की व्यवस्थाओं पर उनका सवाल राजनीतिक होने के बावजूद ऐसा है जिसका जवाब प्रशासन को देना चाहिए।
मुआवजे की इस मांग पर ज़िला प्रशासन या सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा हमें उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिली। इस पर प्रशासन के जवाब का इंतज़ार है।
दोनों पक्षों के तर्क कहां मज़बूत, कहां कमज़ोर
भाजपा का तर्क भावनात्मक रूप से मज़बूत है। राष्ट्रपति आदिवासी समाज से आती हैं, और बस्तर के लिए उनका मुरिया दरबार में शामिल होना प्रतीक के तौर पर बड़ी बात है। ऐसे में ‘मुखौटा’ जैसा शब्द कई लोगों को अपमानजनक लगेगा, खासकर तब जब बोलने वाले नेता खुद बस्तर के आदिवासी समाज से आते हों।
कांग्रेस का तर्क खर्च और जवाबदेही से जुड़ा है। बड़े आयोजनों पर होने वाले खर्च, टेंडर की पारदर्शिता और ज़मीन पर उसके फायदे के सवाल लोकतंत्र में जायज़ हैं। लेकिन इन सवालों का वज़न तभी बढ़ता है जब उनके साथ ठोस आंकड़े और दस्तावेज़ हों। अभी तक बैज ने बस्तर पंडुम के बिल का आंकड़ा तो दिया है, पर टेंडर में गड़बड़ी के आरोप के समर्थन में कोई सबूत सार्वजनिक नहीं किया है।
रथ हादसे का सवाल इन दोनों से अलग है और शायद सबसे अहम भी। एक ग्रामीण की जान गई है। करीब एक हफ्ते में रथ से जुड़ी कई घटनाएं हुई हैं। यह पूछना किसी भी पक्ष की राजनीति से ऊपर है कि सैकड़ों ग्रामीणों की भागीदारी वाली इस रस्म में भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के क्या इंतज़ाम थे। इससे पहले सिरहासर भवन से जोगी परिवार की वापसी और मुरिया दरबार के न्योते पर भी प्रशासन और परंपरा के बीच तालमेल पर सवाल उठ चुके हैं।
आगे क्या देखना होगा
कांग्रेस नेता उमाशंकर शुक्ला ने 23 अक्टूबर को आरोप लगाया कि आदिवासी जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करके मुरिया दरबार को भाजपा का आयोजन बना दिया गया (हिन्दुस्थान समाचार)। साफ है कि राष्ट्रपति का दौरा बीत जाने के बाद भी यह बहस जल्दी खत्म नहीं होगी।
अब तीन बातें देखने वाली होंगी। पहली, क्या प्रशासन रथ हादसे के पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और जांच पर कोई साफ घोषणा करता है। दूसरी, क्या कांग्रेस बस्तर पंडुम के खर्च से जुड़े अपने आरोपों पर दस्तावेज़ सामने रखती है। तीसरी, क्या बैज ‘मुखौटा’ शब्द पर कोई सफाई देते हैं या पार्टी इसी लाइन पर आगे बढ़ती है। बस्तर के लोगों के लिए असली सवाल यही है कि बड़े आयोजनों के शोर के बीच उनकी सुरक्षा और उनकी परंपराओं का सम्मान कितना सुनिश्चित हो पाता है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: ETV भारत, IBC24, हरिभूमि, RNS, हिन्दुस्थान समाचार, लल्लूराम, नईदुनिया, ETV भारत (CM साय), The Lens (YouTube)।








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