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दिवाली से पहले धान खरीदी क्यों नहीं, भूपेश बघेल ने सरकार की ‘बदनीयती’ पर उठाए सवाल

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने धान खरीदी में देरी को सरकार की बदनीयती बताया और दिवाली से पहले खरीदी या अग्रिम भुगतान के साथ ₹3,358 प्रति क्विंटल की मांग की। रिपोर्टों के मुताबिक सरकार की नीति में खरीदी 15 नवंबर से शुरू होनी है।

भूपेश बघेल और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की तस्वीरें, बीच में VS और धान खरीदी पर बघेल का आरोप ‘किसान दिवाली कैसे मनाएं?’
फोटो: Wikimedia Commons (भूपेश बघेल: Domino786, CC0; विष्णुदेव साय: Prime Minister's Office, GODL-India)

मुख्य बातें

  • बघेल का तर्क: एक नवंबर से खरीदी होती तो एक हफ्ता मिल जाता
  • धान खरीदी की तारीख पर उलझन: 15 नवंबर की नीति बनाम ‘घोषणा नहीं’ का आरोप
  • धान खरीदी से पहले चावल का बैकलॉग और पटवारी हड़ताल

छत्तीसगढ़ में दिवाली और धान का रिश्ता बहुत पुराना है। खेत से उपज मंडी या सोसाइटी तक पहुंचती है, भुगतान खाते में आता है, और उसी पैसे से गांवों में त्योहार की खरीदारी होती है। इसी रिश्ते को आधार बनाकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने धान खरीदी में देरी को लेकर विष्णुदेव साय सरकार पर तीखा हमला किया है। उनका आरोप है कि सरकार की नीयत ही ठीक नहीं है।

पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक बघेल ने प्रेसवार्ता में धान खरीदी में हो रही देरी को सोची-समझी बदनीयती करार दिया और कहा कि इससे ऐसा लगता है कि सरकार नहीं चाहती कि प्रदेश के किसान, गरीब और मजदूर ठीक से दीपावली मना सकें। उन्होंने मांग की कि या तो दिवाली से पहले खरीदी शुरू हो, या फिर किसानों को अग्रिम भुगतान दिया जाए।

वीडियो स्रोत: The Lens (YouTube) | मूल वीडियो देखें

बघेल का तर्क: एक नवंबर से खरीदी होती तो एक हफ्ता मिल जाता

The Lens के वीडियो में बघेल अपना हिसाब सीधे सामने रखते हैं। उनके मुताबिक त्योहार 8-9 नवंबर से शुरू होगा, और अगर सरकार 1 नवंबर से खरीदी शुरू करती तो कम से कम 5-6 नवंबर तक एक हफ्ते की खरीदी हो जाती, जिससे किसान और मजदूर “बढ़िया से दीपावली मना लेते”। उन्होंने यह भी कहा कि 1 नवंबर तक काफी धान आ जाता है, क्योंकि अर्ली वैरायटी का धान तब तक तैयार हो जाता है।

तंज भरे लहजे में उन्होंने जोड़ा कि सरकार की मंशा ही नहीं है कि गरीब और किसान के घर में दिया जले, “क्योंकि सारा दिया और सारा तेल तो प्रधानमंत्री के जन्मदिन के दिन उन्होंने जलवा दिए।” उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र आएगा तो वे पूछेंगे कि इतना बजट किस मद से खर्च हुआ।

CG News की रिपोर्ट के अनुसार बघेल ने याद दिलाया कि पिछली व्यवस्था में 1 नवंबर को राज्योत्सव के आसपास खरीदी शुरू हो जाती थी, ताकि किसानों को त्योहार से पहले भुगतान मिल सके। इस बार, उनके मुताबिक, न बारदाने की तैयारी दिख रही है और न खरीदी केंद्रों की।

₹3,358 का हिसाब कहां से आया

बघेल की दूसरी बड़ी मांग कीमत को लेकर है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में धान के लिए ₹3,100 प्रति क्विंटल देने का वादा किया था। बघेल का कहना है कि उसके बाद केंद्र ने समर्थन मूल्य में तीन साल में कुल ₹258 की बढ़ोतरी की है, CG News के मुताबिक 2024-25 में ₹117, 2025-26 में ₹69 और 2026-27 में ₹72। उनका तर्क है कि अगर वादा ₹3,100 का था तो MSP की बढ़ोतरी उसमें जुड़नी चाहिए, यानी किसानों को ₹3,358 प्रति क्विंटल मिलना चाहिए।

संदर्भ के लिए, CG Now के अनुसार खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र का घोषित MSP सामान्य धान के लिए ₹2,441 और ग्रेड-ए के लिए ₹2,461 प्रति क्विंटल है। राज्य सरकार ₹3,100 देने की बात करती रही है, इसलिए असल बहस इस फर्क पर है कि MSP बढ़ने का फायदा किसान तक अलग से पहुंचे या ₹3,100 के भीतर ही समा जाए।

धान खरीदी की तारीख पर उलझन: 15 नवंबर की नीति बनाम ‘घोषणा नहीं’ का आरोप

यहां एक बात साफ कर देना ज़रूरी है। बघेल कह रहे हैं कि सरकार ने अब तक खरीदी की तारीख घोषित नहीं की, लेकिन 16 अक्टूबर को CG Now और हरिभूमि ने खबर दी थी कि राज्य सरकार ने 2026-27 की धान खरीदी नीति जारी कर दी है, जिसके तहत खरीदी 15 नवंबर 2026 से 31 जनवरी 2027 तक चलेगी और 160 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य रखा गया है। इन रिपोर्टों के मुताबिक प्रति एकड़ 21 क्विंटल की सीमा, छोटे और सीमांत किसानों के लिए रोज़ की खरीदी में 70 प्रतिशत कोटा, एग्रीस्टैक पोर्टल पर पंजीयन और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसे प्रावधान भी तय किए गए हैं।

कांग्रेस के भीतर भी इसी 15 नवंबर की तारीख पर सवाल उठ चुके हैं। दैनिक भास्कर के मुताबिक कांग्रेस संचार विभाग के पूर्व प्रमुख शैलेश नितिन त्रिवेदी ने 15 नवंबर से खरीदी शुरू करने के फैसले को किसान विरोधी बताया और कहा कि 8 नवंबर को दिवाली है, ऐसे में किसानों के पास त्योहार के लिए पैसे कहां से आएंगे। यानी विवाद असल में तारीख के होने या न होने से ज़्यादा इस बात पर है कि खरीदी दिवाली के बाद शुरू हो रही है। TimeTrolls इस नीति की आधिकारिक अधिसूचना को स्वतंत्र रूप से नहीं देख सका है।

धान खरीदी से पहले चावल का बैकलॉग और पटवारी हड़ताल

बघेल का तीसरा आरोप व्यवस्था की तैयारी से जुड़ा है। पत्रिका और CG News के मुताबिक उन्होंने सरकार के पोर्टल पर 25 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पिछले साल का कुल 89 लाख टन चावल FCI में जमा होना था, जिसमें से सिर्फ 37.50 लाख टन जमा हुआ और 51.50 लाख टन बाकी है। उनका आरोप है कि मिलों में जगह की कमी और संग्रहण केंद्र खाली न होने से व्यवस्था चरमरा गई है, और इसी नाकामी को छिपाने के लिए खरीदी टाली जा रही है।

इसके साथ पटवारियों की हड़ताल का मुद्दा भी जुड़ा है। धान बेचने के लिए पंजीयन की अंतिम तिथि 31 अक्टूबर बताई गई है, लेकिन बघेल के मुताबिक हड़ताल की वजह से फौती, नामांतरण, बंटवारा और रिकॉर्ड सुधार जैसे काम अटके हैं और किसान तहसील दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। उनका कहना है कि अगर समय पर रिकॉर्ड दुरुस्त नहीं हुए तो कई किसान धान बेचने से वंचित रह सकते हैं।

प्रेसवार्ता में बघेल ने महतारी वंदन योजना में कथित वसूली और लाभार्थियों की संख्या घटने पर भी सवाल उठाए और चेतावनी दी कि कांग्रेस इन मुद्दों पर “सड़क से लेकर सदन तक” संघर्ष करेगी।

सरकार की ओर से अब तक क्या

इस खबर के लिखे जाने तक बघेल के ताज़ा आरोपों, खासकर ₹3,358 की मांग, चावल जमा होने के आंकड़ों और अग्रिम भुगतान की मांग पर राज्य सरकार या भाजपा की ओर से कोई सीधी प्रतिक्रिया हमें नहीं मिली है। सरकार का जवाब का इंतज़ार है। सरकार का रुख अब तक उसकी घोषित खरीदी नीति के रूप में ही सामने है, जिसमें पारदर्शिता, बिचौलियों पर अंकुश और छोटे किसानों को प्राथमिकता देने पर ज़ोर बताया गया है।

किसान के लिए इस बहस का मतलब

छत्तीसगढ़ में धान सिर्फ फसल नहीं, राजनीति की धुरी भी है। 2018 में कांग्रेस और 2023 में भाजपा, दोनों ने धान की कीमत को चुनावी वादे के केंद्र में रखा था। इसलिए खरीदी की तारीख, कीमत और भुगतान की रफ्तार पर हर साल खींचतान होती है। इस बार दिवाली 8 नवंबर को है और खरीदी नीति के मुताबिक 15 नवंबर से शुरू होनी है, यानी बीच का करीब एक हफ्ता किसान के लिए नकदी का संकट बन सकता है। विपक्ष का डर है कि इस दौरान ज़रूरतमंद किसान कम दाम पर बिचौलियों को धान बेचने को मजबूर होंगे।

दूसरी तरफ सरकार के लिए नमी वाला धान, भंडारण और पिछले साल का बकाया चावल असली चुनौतियां हैं। जल्दी खरीदी शुरू करने का मतलब है गीला धान और गोदामों पर और दबाव। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सरकार अग्रिम भुगतान या पंजीयन की तारीख बढ़ाने जैसा कोई बीच का रास्ता निकालती है या 15 नवंबर पर ही टिकी रहती है।

खबर में पत्रिका, CG News, CG Now, हरिभूमि और दैनिक भास्कर की रिपोर्टों से तथ्य लिए गए हैं।

Bharat Hirwani

भरत हिरवानी Timetrolls.in के संस्थापक और संपादक हैं। वे टेक, AI, सरकारी योजनाओं और देश-दुनिया की खबरें आसान हिंदी में, आधिकारिक स्रोतों से जाँचकर लिखते हैं। नौकरी की ताज़ा खबरों के लिए उनकी वेबसाइट bharathirwanijobs.com भी देखें।

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