छत्तीसगढ़ में धान सिर्फ फसल नहीं, सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी है। हर साल नवंबर के आसपास खरीदी शुरू होने से पहले कीमत, बोनस और बकाया पर बहस तेज़ होती है। इस बार यह बहस एक बड़े आंकड़े के साथ शुरू हुई है। प्रदेश किसान संघ का दावा है कि राज्य के किसानों का 6,066 करोड़ रुपये सरकार पर बकाया है, और इसकी मांग को लेकर संघ 26 अक्टूबर से ‘किसान भुगतान यात्रा’ निकालेगा।
छह दिन, छह ज़िले
दैनिक भास्कर के मुताबिक यह यात्रा ‘दाम सत्याग्रह’ के तहत होगी। हर पड़ाव पर ज़िला मुख्यालय में प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया जाएगा। कार्यक्रम इस तरह है:
- 26 अक्टूबर: रायपुर
- 27 अक्टूबर: धमतरी
- 28 अक्टूबर: कांकेर
- 29 अक्टूबर: कोंडागांव
- 30 अक्टूबर: जगदलपुर
- 31 अक्टूबर: नारायणपुर
संघ के संयोजक सुदेश टीकम ने इस साल धान 3,358 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदने और समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का कानून बनाने की मांग की है। इसके साथ 12 सूत्रीय मांगें भी रखी जाएंगी, जिनमें प्राकृतिक आपदा से राहत, बिजली कटौती रोकना, खाद की कालाबाजारी पर रोक, मंडियों में अनियमितताओं पर नियंत्रण और सिंचाई सुविधा बढ़ाना शामिल है।
6,066 करोड़ का हिसाब कैसे बनता है
संघ का तर्क MSP बढ़ोतरी से जुड़ा है। उसके मुताबिक 2024-25 में धान का समर्थन मूल्य 117 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा, लेकिन किसानों को इसका फायदा नहीं मिला। 2025-26 में यह 69 रुपये और बढ़ा, यानी कुल बढ़ोतरी 186 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। संघ का कहना है कि राज्य सरकार प्रति क्विंटल 3,100 रुपये के अपने तय दाम पर ही टिकी रही और MSP बढ़ने का अंतर किसानों तक नहीं पहुंचा।
दैनिक भास्कर की खबर में 2024-25 की अंतर राशि 1,743 करोड़ और इस सीज़न की 2,023 करोड़ बताई गई है। The Voice TV से बातचीत में टीकम ने इस सीज़न का आंकड़ा 2,623 करोड़ बताया, और दोनों अंतर राशियों को मिलाकर 4,366 करोड़ कहा। बाकी 1,700 करोड़ रुपये वे राजीव गांधी किसान न्याय योजना की चौथी किस्त के बताते हैं। इन तीनों को जोड़ने पर ही 6,066 करोड़ का आंकड़ा बनता है, इसलिए भास्कर में छपा 2,023 करोड़ संभवतः छपाई की चूक है। ये सभी आंकड़े संघ के दावे हैं। सरकार ने इन्हें न स्वीकार किया है, न खारिज।
वीडियो स्रोत: The Voice TV (YouTube) | मूल वीडियो देखें
एक जैसी मांग, अलग-अलग संगठन
₹3,358 प्रति क्विंटल की मांग अकेले प्रदेश किसान संघ की नहीं है। नईदुनिया की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक RSS से जुड़े भारतीय किसान संघ ने भी, जिसके प्रदेश अध्यक्ष माधो सिंह ठाकुर हैं, यही दाम और 2022-23 के बोनस की चौथी किस्त के 1,700 करोड़ रुपये मांगे हैं। उसने 27 अक्टूबर को मंत्रालय घेराव की चेतावनी दी है। दोनों अलग संगठन हैं, लेकिन उनकी मांगें काफी मिलती हैं। यानी यह मुद्दा अब किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है।
विपक्ष भी इसी मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हाल में दिवाली से पहले धान खरीदी न होने पर सवाल उठाए थे और 3,358 रुपये की मांग की थी। राजीव गांधी किसान न्याय योजना कांग्रेस सरकार के समय की योजना थी, इसलिए उसकी बकाया किस्त का सवाल कांग्रेस और भाजपा के बीच पुरानी तकरार को भी फिर से खोलता है।
सरकार क्या कह रही है
कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने नईदुनिया से कहा था:
धान खरीदी की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। किसी संगठन ने कीमत बढ़ाने की मांग की है, इसकी जानकारी अभी नहीं है।
रामविचार नेताम, कृषि मंत्री (नईदुनिया, 14 अक्टूबर)
यह बयान प्रदेश किसान संघ की ताज़ा यात्रा की घोषणा से पहले का है। 6,066 करोड़ के दावे और यात्रा पर सरकार की नई प्रतिक्रिया हमें उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिली। इस पर सरकार के जवाब का इंतज़ार है। धान खरीदी की तारीख और दाम पर अंतिम फैसला कैबिनेट से आना है, और उसकी आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है।
बहस का असली पेच
सरकार के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि 3,100 रुपये प्रति क्विंटल का दाम पहले से ही केंद्र के MSP से काफी ऊपर है। इसलिए MSP बढ़ने का मतलब यह नहीं कि राज्य का तय दाम भी अपने आप उतना बढ़े। किसान संगठनों का तर्क यह है कि 3,100 रुपये के वादे को वे न्यूनतम दाम की तरह देखते हैं, और MSP बढ़ने के बाद उस पर बढ़ोतरी न होने से असल फायदा घट गया।
दोनों तर्कों का फैसला आखिरकार बजट और राजनीति से होगा। धान खरीदी पर राज्य का खर्च पहले से बड़ा है। इसलिए हर अतिरिक्त रुपये का असर हज़ारों करोड़ में बैठता है। दूसरी ओर, किसान छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग हैं और कोई भी दल इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले सकता।
अगले हफ्ते दो तारीखें अहम होंगी। 26 अक्टूबर को रायपुर से यात्रा शुरू होगी, और 27 अक्टूबर को भारतीय किसान संघ का घेराव प्रस्तावित है। उसी हफ्ते सरकार से धान खरीदी के दाम और तारीख पर स्पष्ट घोषणा की उम्मीद है। तब पता चलेगा कि 6,066 करोड़ का यह दावा सिर्फ दबाव की राजनीति बनकर रह जाता है या सरकार इसमें से किसी हिस्से पर सहमति देती है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: दैनिक भास्कर, नईदुनिया, The Voice TV (YouTube)।








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