बस्तर दशहरा की सबसे पुरानी और सबसे लोकतांत्रिक मानी जाने वाली रस्म, मुरिया दरबार, इस बार राष्ट्रपति के आगमन से पहले ही सियासी बहस के केंद्र में आ गई। पहले एक प्रशासनिक पर्चे में ‘मुरिया दरबार’ की जगह ‘आम दरबार’ छप गया, फिर न्योते में आदिवासी जनप्रतिनिधियों के नाम न होने पर सवाल उठे, और 23 अक्टूबर की सुबह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रायपुर एयरपोर्ट पर कांग्रेस पर सीधा पलटवार कर दिया।
सवाल छोटा दिखता है, एक शब्द और एक निमंत्रण पत्र का। लेकिन बस्तर में यह शब्द सदियों पुरानी उस व्यवस्था की पहचान है, जिसमें गांवों के मांझी-चालकी सीधे सत्ता के सामने अपनी बात रखते हैं। यही वजह है कि नाम में हुई एक चूक भी यहां आस्था और अस्मिता का सवाल बन जाती है।
पर्चे में ‘आम दरबार’ और फिर नया पर्चा
लल्लूराम की रिपोर्ट के मुताबिक विवाद तब शुरू हुआ जब बस्तर दशहरा के कार्यक्रमों की जानकारी देने वाले प्रशासनिक पाम्पलेट में करीब 700 साल पुरानी इस परंपरा का नाम ‘मुरिया दरबार’ की जगह ‘आम दरबार’ लिख दिया गया। सोशल मीडिया पर यह बात फैली तो सवाल उठने लगे कि क्या परंपरा का नाम बदला जा रहा है। मामला गरमाने के बाद जिला प्रशासन ने सोमवार को नया पाम्पलेट जारी किया, जिसमें फिर से ‘मुरिया दरबार’ दर्ज किया गया।
The Lens की ग्राउंड रिपोर्ट में एक और परत सामने आती है। उसके मुताबिक रस्मों की जिस सूची में ‘आम दरबार’ लिखा था, वह मां दंतेश्वरी मंदिर की ओर से जारी हुई थी, और साथ में यह चर्चा भी चल पड़ी कि दरबार ऐतिहासिक सिरहासार भवन के बजाय लालबाग मैदान में हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार जिला प्रशासन यह स्पष्ट कर चुका था कि न नाम बदला गया है, न आयोजन स्थल।
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लखेश्वर बघेल का सवाल: न्योते में हमारे नाम कहां हैं
दूसरा मोर्चा निमंत्रण पत्र को लेकर खुला। दैनिक भास्कर के मुताबिक विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष और बस्तर के कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने कहा कि मुरिया दरबार के निमंत्रण पत्र में संभाग के आदिवासी जनप्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों के नाम शामिल नहीं हैं, जिससे उनकी भागीदारी पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बस्तर की आदिवासी परंपरा से जुड़े इतने बड़े आयोजन में स्थानीय प्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों को उचित स्थान मिलना चाहिए।
दिलचस्प यह है कि बघेल ने जिन नामों का ज़िक्र किया, उनमें सिर्फ कांग्रेस के लोग नहीं हैं। सूची में कांकेर सांसद भोजराज नाग, चित्रकोट विधायक विनायक गोयल, कोंडागांव विधायक लता उसेंडी, केशकाल विधायक नीलकंठ टेकाम, कांकेर विधायक आसाराम नेताम और अंतागढ़ विधायक विक्रम उसेंडी जैसे भाजपा के जनप्रतिनिधि भी हैं, और कोंटा विधायक कवासी लखमा, बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी, भानुप्रतापपुर विधायक सावित्री मंडावी जैसे कांग्रेस के भी। यानी उनका तर्क दलगत कम और ‘बस्तर के चुने हुए आदिवासी चेहरों’ की नुमाइंदगी से ज़्यादा जुड़ा हुआ दिखता है।
भास्कर ने यह भी दर्ज किया है कि इन प्रतिनिधियों को अलग से आमंत्रित किया गया है या नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, और संस्कृति विभाग, जिला प्रशासन तथा बस्तर दशहरा समिति का पक्ष सामने आना बाकी था। यानी फिलहाल यह आरोप ही है, जिसका जवाब संबंधित विभागों की ओर से आना है।
बघेल ने इसी मौके पर इंद्रावती नदी की बाढ़ से प्रभावित परिवारों का मुद्दा भी उठाया। उनकी मांग थी कि मुरिया दरबार में शामिल होने वाले जनप्रतिनिधि बाढ़ प्रभावित किसानों, मजदूरों और परिवारों की समस्याएं राष्ट्रपति तक पहुंचाएं, और राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC) 6-4 के तहत मिलने वाली सहायता राशि बढ़ाने, मकान क्षति के सही आकलन और फसल नुकसान के मुआवज़े जैसे सवाल भी उठें।
कांग्रेस प्रवक्ता और भाजपा सांसद आमने-सामने
The Lens की रिपोर्ट में कांग्रेस प्रवक्ता जावेद खान ने नाम बदलने की कोशिश को आदिवासी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा गंभीर मामला बताया। उन्होंने माड़िया चौक का नाम बदलने के पुराने विवाद का भी हवाला दिया और कहा कि राजशाही काल से चले आ रहे बस्तर दशहरा में कांग्रेस पार्टी “1 इंच का भी बदलाव” बर्दाश्त नहीं करेगी।
दूसरी तरफ बस्तर से भाजपा सांसद महेश कश्यप ने इन बातों को अफवाह बताया। उसी रिपोर्ट में वे कहते हैं कि मुरिया दरबार पुरानी व्यवस्था के अनुसार ऐतिहासिक सिरहासार भवन में ही होगा, जहां मांझी-चालकी और रस्मों से जुड़े समाजों के प्रमुख मौजूद रहेंगे, जबकि लालबाग मैदान में राष्ट्रपति का संबोधन होगा। उनके मुताबिक दरबार के लालबाग में होने की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है, “और ऐसा होगा भी नहीं”।
मुख्यमंत्री साय का पलटवार
23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ जगदलपुर रवाना होने से पहले रायपुर एयरपोर्ट पर मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राजनीतिकरण के आरोपों का जवाब दिया। लल्लूराम के मुताबिक उन्होंने कहा कि जिस जनजाति समाज का कांग्रेस ने लगातार वोट बैंक के रूप में उपयोग किया, आज वह समाज कांग्रेस को छोड़ चुका है। साय ने कहा कि उनकी सरकार जनजाति समाज का लगातार विकास कर रही है और कांग्रेस के लोग बताएं कि इतने साल देश में राज करने के दौरान उन्होंने जनजाति समाज के लिए क्या किया।
साय ने इस दौरे को छत्तीसगढ़ के लिए ऐतिहासिक दिन बताया और कहा कि पहली बार देश की राष्ट्रपति बस्तर दशहरा के इस कार्यक्रम में शामिल हो रही हैं। गौर करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री के जवाब में निमंत्रण पत्र में नाम न होने के खास आरोप पर कोई सीधी टिप्पणी रिपोर्ट में दर्ज नहीं है; उन्होंने बहस को कांग्रेस के रिकॉर्ड की ओर मोड़ दिया।
मुरिया दरबार क्यों इतना अहम है
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे चलने वाले त्योहारों में गिना जाता है और इसका केंद्र राम-रावण की कथा नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी समाज की भागीदारी है। मुरिया दरबार इस पूरे उत्सव की वह कड़ी है जहां परंपरा और प्रशासन आमने-सामने बैठते हैं। राजशाही के दौर में राजा इस दरबार में बैठते थे और गांवों के मांझी-चालकी अपने इलाके की समस्याएं रखते थे। राजशाही खत्म होने के बाद भी यह परंपरा चली आ रही है और अब मुख्यमंत्री इस दरबार में पहुंचकर लोगों की बात सुनते हैं।
पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मुरिया दरबार में शामिल हुए थे। इस बार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कार्यक्रम है, जो खुद आदिवासी समाज से आती हैं। ऐसे में ‘आम दरबार’ जैसा शब्द, भले ही वह छपाई की चूक हो या किसी का गलत अनुवाद, बस्तर के लोगों को इसलिए खटका क्योंकि ‘मुरिया’ शब्द ही इस दरबार की आदिवासी जड़ों की याद दिलाता है।
चूक, संदेश और राजनीति
इस पूरे प्रकरण में तीन अलग-अलग बातें आपस में गुंथ गई हैं। पहली, पर्चे में नाम की गलती, जिसे प्रशासन ने नया पर्चा जारी कर सुधार दिया। दूसरी, आयोजन स्थल बदलने की चर्चा, जिसे भाजपा सांसद और प्रशासन दोनों खारिज कर चुके हैं। तीसरी, निमंत्रण पत्र में आदिवासी जनप्रतिनिधियों के नाम न होने का आरोप, जिस पर विभागों का स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है।
राजनीतिक तौर पर दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी गढ़ रहे हैं। कांग्रेस इसे आदिवासी पहचान से छेड़छाड़ के पैटर्न के रूप में पेश कर रही है, जबकि भाजपा इसे अफवाह और कांग्रेस की हताशा बता रही है। बस्तर की 12 विधानसभा सीटें और आदिवासी वोट दोनों दलों के लिए अहम हैं, इसलिए एक पर्चे की चूक भी जल्दी बड़ी बहस बन जाती है। अब नज़र इस पर रहेगी कि दरबार में किसे जगह मिलती है और राष्ट्रपति के सामने बाढ़ पीड़ितों की बात पहुंचती है या नहीं।
इस खबर के तथ्य लल्लूराम, दैनिक भास्कर (जगदलपुर) और The Lens की वीडियो रिपोर्ट पर आधारित हैं।







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