छत्तीसगढ़ में 15 नवंबर से धान खरीदी शुरू होनी है, लेकिन उससे पहले राजस्व विभाग की सबसे निचली और सबसे अहम कड़ी, पटवारी, 13 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। दस दिन बाद भी गतिरोध खत्म नहीं हुआ है, और अब तहसीलदार संघ ने भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर चेताया है कि डिजिटल फसल सर्वे का बड़ा हिस्सा अभी अधूरा है।
यह मामला सीधे किसानों से जुड़ा है। धान बेचने के लिए किसान का पंजीयन और उसके खेत में बोई गई फसल का सत्यापन ज़रूरी है, और यह काम गिरदावरी यानी फसल सर्वे से होता है। गिरदावरी पटवारी करते हैं।
तहसीलदार संघ की चिट्ठी में क्या आंकड़े हैं
हरिभूमि की 24 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक तहसीलदार संघ ने 23 अक्टूबर को मुख्यमंत्री को पत्र भेजा। पत्र में डिजिटल क्रॉप सर्वे की स्थिति इस तरह बताई गई है:
- कुल खसरे: 32,15,837, जिनमें से 8,48,504 का सर्वे हुआ और 23,67,333 बाकी हैं।
- धान वाले खसरे: 16,24,868, जिनमें से 5,67,991 का सर्वे पूरा हुआ और 10,56,873 बाकी हैं।
यानी पत्र के आंकड़ों के मुताबिक कुल खसरों में से करीब एक-चौथाई का ही सर्वे हो पाया है। संघ ने तकनीकी दिक्कतें भी गिनाई हैं: कई खसरे जियो-रेफरेंस्ड नहीं हैं, पॉलीगॉन ट्रेसिंग में गड़बड़ी है, GPS लोकेशन सही नहीं आती, नेटवर्क नहीं मिलता और सर्वर बार-बार अटकता है।
संघ की मांगें भी साफ हैं: पटवारियों की हड़ताल जल्द खत्म कराई जाए, PV ऐप की तकनीकी खामियां दूर हों, सर्वे के लिए व्यावहारिक समय-सीमा तय हो, तहसीलदारों को अनिवार्य फील्ड सर्वे से छूट मिले, और पूरे काम के लिए एक स्पष्ट SOP जारी हो।
पटवारी हड़ताल पर क्यों हैं
विवाद की जड़ नया PV ऐप है, जिसके ज़रिए डिजिटल क्रॉप सर्वे किया जा रहा है। पटवारी संघ का कहना है कि वह डिजिटल व्यवस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि ज़मीन पर काम न करने वाली तकनीक के खिलाफ है। नईदुनिया की कोरबा रिपोर्ट में संघ के पदाधिकारी मिथलेश वर्मा के हवाले से यही बात कही गई है: नेटवर्क नहीं, डेटा सिंक नहीं होता, ऐप में बार-बार त्रुटि आती है, और ऊपर से कारण बताओ नोटिस, निलंबन और वेतन रोकने जैसी कार्रवाई हो रही है।
ETV भारत की 13 अक्टूबर की रिपोर्ट में पटवारी संघ के सुधीर लकड़ा ने कहा:
जिन खेतों की मैपिंग अब तक नहीं हुई है, उनके लिए जमीन को ऐप के माध्यम से चिह्नित करने की प्रक्रिया के बजाय सामान्य तरीके से काम करने की व्यवस्था की जाए।
सुधीर लकड़ा, पटवारी संघ (ETV भारत से)
ETV भारत के मुताबिक हड़ताल की पृष्ठभूमि में महासमुंद में पांच पटवारियों का निलंबन और बलौदाबाज़ार में तबादले भी हैं। साथ ही वेतन विसंगति की पुरानी मांग भी इसमें जुड़ी है। हड़ताल के चलते कई ज़िलों में आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र जैसे काम भी अटके हुए हैं।
वीडियो स्रोत: NDTV MP Chhattisgarh (YouTube) | मूल वीडियो देखें
सरकार का पक्ष
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने हड़ताल की शुरुआत में ही डिजिटल सर्वे का बचाव किया था। नवभारत लाइव की 13 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक मंत्री ने कहा कि दूसरे राज्यों से आने वाले धान को रोकने के लिए डिजिटल क्रॉप सर्वे ज़रूरी है, इस साल करीब 19,000 गांवों में सर्वे हो रहा है जबकि पिछले साल यह संख्या करीब 14,000 थी, और करीब 1.90 करोड़ खसरों का काम लगभग 95% पूरा हो चुका है। उन्होंने यह भी कहा था कि हड़ताल की जानकारी देने उनके पास कोई नहीं आया।
यहां आंकड़ों में बड़ा फर्क दिखता है: मंत्री के मुताबिक 95% काम पूरा, जबकि तहसीलदार संघ के पत्र के मुताबिक करीब 26%। बहुत मुमकिन है कि दोनों आंकड़े अलग-अलग दायरों के हों, जैसे पूरे प्रदेश के कुल खसरे बनाम डिजिटल सर्वे वाले गांवों के खसरे, या अलग-अलग तारीखें। लेकिन किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण के बिना यह तय करना मुश्किल है। इस अंतर पर राजस्व विभाग के जवाब का इंतज़ार है। दैनिक छत्तीसगढ़ वॉच की 17 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक तब तक सरकार और पटवारी संघ के बीच कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई थी, और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया था।
किसान के लिए दांव पर क्या है
धान खरीदी छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है, और हर साल यह राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा भी बनती है। धान खरीदी पर पहले से चल रही सियासत और किसानों के बकाया भुगतान जैसे सवाल पहले से गरम हैं। अगर गिरदावरी अधूरी रही, तो इसके तीन सीधे असर हो सकते हैं:
- जिन किसानों के खसरे का सत्यापन नहीं हुआ, उनका पंजीयन या रकबा अटक सकता है, और खरीदी केंद्र पर बहस बढ़ सकती है।
- जल्दबाज़ी में सर्वे हुआ तो गलत फसल या गलत रकबा दर्ज होने का खतरा है, जिसे बाद में सुधरवाने के लिए किसान को तहसील के चक्कर काटने पड़ते हैं।
- प्रमाण पत्र, नामांतरण और बंटवारे जैसे राजस्व के रोज़मर्रा के काम पहले से रुके हैं, और धान खरीदी के दौरान दबाव और बढ़ेगा।
गतिरोध कैसे टूट सकता है
हड़ताल में दोनों पक्षों की बातों में दम है। सरकार का तर्क है कि डिजिटल सर्वे के बिना फर्ज़ी रकबे और बाहर के धान की बिक्री रोकना मुश्किल है। पटवारियों का तर्क है कि जिन गांवों में नेटवर्क नहीं है और नक्शे जियो-रेफरेंस्ड नहीं हैं, वहां ऐप से काम कराना और फिर देरी पर सज़ा देना ठीक नहीं। तहसीलदार संघ की चिट्ठी बीच का रास्ता सुझाती है: तकनीकी खामियां दूर हों, समय-सीमा व्यावहारिक हो और SOP साफ हो। हाल ही में कोटवारों का धरना भी इसी विभाग से जुड़ा था, यानी राजस्व महकमे में असंतोष एक से ज़्यादा स्तर पर है।
धान खरीदी शुरू होने में अब करीब तीन हफ्ते बचे हैं। अगले कुछ दिनों में सरकार और पटवारी संघ के बीच बातचीत होती है या नहीं, यही तय करेगा कि 15 नवंबर को खरीदी केंद्रों पर किसान का अनुभव कैसा रहेगा।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: हरिभूमि, दैनिक भास्कर, नईदुनिया, ETV भारत, नवभारत लाइव, दैनिक छत्तीसगढ़ वॉच।

टिप्पणियाँ