गांव के तालाब में कमर तक पानी में खड़े लोग, हाथों में तख्तियां और एक ही मांग कि उनकी ज़मीन पर परमाणु बिजलीघर न बने। मध्य प्रदेश के रीवा ज़िले के रोझौही और सरई कला इलाके में पिछले कई दिनों से यही तस्वीर थी। गुरुवार, 23 अक्टूबर को इस आंदोलन से एक दुखद खबर आई। जल सत्याग्रह में शामिल आदिवासी महिला विमला कोल की मौत हो गई।
क्या हुआ था
दैनिक भास्कर के मुताबिक रोझौही की रहने वाली विमला कोल करीब चार दिन से जल सत्याग्रह कर रही थीं। बुधवार रात उनकी तबीयत बिगड़ी। परिजन उन्हें मनगवां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां गुरुवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनके पति जमुना कोल ने गुरुवार दोपहर अंतिम संस्कार किया।
मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया। क्या प्रशासन मेरी पत्नी को मुझे लौटा सकता है? क्या उसे जिंदा कर सकता है?
जमुना कोल, विमला कोल के पति (दैनिक भास्कर के अनुसार)
मौत की वजह पर दो अलग बातें सामने हैं। नवभारत टाइम्स के अनुसार प्रशासन मौत को बीमारी से जोड़ रहा है और जांच के आदेश दिए गए हैं। आंदोलन कर रहे लोग इसे आंदोलन से जोड़ रहे हैं। रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने कहा है कि जांच के बाद ही असली वजह का पता चलेगा। ग्राउंड रिपोर्ट ने भी साफ लिखा है कि मौत के सटीक चिकित्सकीय कारण और जल सत्याग्रह से उसके सीधे संबंध की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
परियोजना क्या है और विरोध क्यों
ग्राउंड रिपोर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस की 12 अक्टूबर की खबर के हवाले से बताया कि टाटा पावर ने 13 जुलाई 2026 के पत्र में रोझौही के पास 2×220 मेगावाट परमाणु ऊर्जा परियोजना के लिए शुरुआती गतिविधियां शुरू करने की बात कही थी। ज़िला प्रशासन के 21 अगस्त के पत्र में ज़मीन की भूवैज्ञानिक जांच के लिए आठ बोरहोल प्रस्तावित थे। दैनिक भास्कर इसे करीब 28 हज़ार करोड़ रुपये की परियोजना बताता है, और The Lens की रिपोर्ट के मुताबिक इसे देश का पहला निजी परमाणु बिजलीघर बताया जा रहा है।
ग्रामीणों की चिंता ज़मीन, पानी, खेती, पर्यावरण और सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर है। गांववालों का दावा है कि परियोजना का असर 100 गांवों तक हो सकता है। 9 अक्टूबर को ड्रिलिंग मशीनें पहुंचीं तो ग्रामीणों ने काम रुकवा दिया। नवभारत टाइम्स के मुताबिक विरोध को देखते हुए काम फिलहाल रोका गया है। आंदोलन में कांग्रेस के नेता शामिल हैं और आम आदमी पार्टी के नेता प्रमोद शर्मा भी कई दिन से ग्रामीणों के साथ जल सत्याग्रह कर रहे हैं।
वीडियो स्रोत: The Lens (YouTube) | मूल वीडियो देखें
ग्रामसभा की सहमति पर टकराव
इस विवाद का सबसे अहम कानूनी सवाल ग्रामसभा की सहमति का है। ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक 3 सितंबर को सरई कला की विशेष ग्रामसभा की कार्यवाही में परियोजना पर आपत्तियां दर्ज हुई थीं। सरपंच कोमल सिंह ने 5 सितंबर को कलेक्टर को पत्र लिखकर कहा कि ग्रामसभा ने परियोजना को सहमति नहीं दी।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी का आरोप है कि परियोजना ग्रामसभा की सहमति के बिना आगे बढ़ाई जा रही है और कथित अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) एक फर्जी पत्र के आधार पर बना। ये आरोप हैं और इनकी जांच की मांग हो रही है। कलेक्टर सूर्यवंशी का कहना इसके उलट है। उनके मुताबिक विरोध शुरू होने से पहले प्रशासन को ग्रामसभा की सहमति मिली थी और NOC पर उसी आधार पर कार्रवाई हुई।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन ने पहले कहा था कि टाटा पावर को अभी कोई ज़मीन आवंटित नहीं हुई है और बोरहोल केवल यह जांचने के लिए हैं कि जगह परियोजना के लायक है या नहीं। ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक कलेक्टर ने अपने आधिकारिक फेसबुक हैंडल पर कहा:
रोझौही में प्रस्तावित औद्योगिक इकाई के लिए अभी केवल सर्वे किया गया है। आठ बोरहोल के जरिए मिट्टी और जमीन की जांच की जा रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर इकाई स्थापित करने के संबंध में निर्णय लिया जाएगा। यहां हो रहे कार्यों से जनता के हितों को नुकसान नहीं होगा।
नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी, कलेक्टर, रीवा (ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार)
मनगवां विधायक नरेंद्र प्रजापति, कलेक्टर, SDM और गढ़ थाना प्रभारी समेत अधिकारी ग्रामीणों को समझाने गांव पहुंचे थे, लेकिन बातचीत के बाद भी विरोध जारी रहा। विमला कोल की मौत के बाद शिवानंद द्विवेदी ने पूछा, “आखिर प्रशासन कितने लोगों की जान लेना चाहता है।” टाटा पावर की ओर से इस मौत या विरोध पर कोई बयान हमें नहीं मिला। कंपनी के जवाब का इंतज़ार है।
विश्लेषण: ‘सिर्फ सर्वे’ वाली दलील कितनी काफी
प्रशासन की यह बात तकनीकी रूप से सही हो सकती है कि बोरहोल का मतलब निर्माण नहीं है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल भी उतना ही सीधा है। अगर जगह परमाणु बिजलीघर के लिए जांची जा रही है, तो परियोजना प्रस्तावित ही है। और जब ग्रामसभा की आपत्ति दर्ज हो, तब सहमति पर उठे सवाल सुलझाए बिना ज़मीन की जांच क्यों आगे बढ़े।
परमाणु परियोजनाओं पर स्थानीय भरोसा बनाना हमेशा कठिन रहा है। सुरक्षा, विस्थापन और पानी के इस्तेमाल पर लोगों को लिखित और साफ जानकारी चाहिए होती है। रीवा में अभी तक ऐसी कोई सार्वजनिक सुनवाई या पर्यावरण प्रभाव रिपोर्ट सामने आने की जानकारी नहीं है, क्योंकि परियोजना शुरुआती चरण में बताई जा रही है। ऐसे में अफवाह और डर दोनों तेज़ी से फैलते हैं।
अब सबसे पहले विमला कोल की मौत की जांच रिपोर्ट अहम होगी। साथ ही यह देखना होगा कि कथित NOC की जांच होती है या नहीं, ग्रामसभा के प्रस्तावों पर प्रशासन क्या रुख लेता है, और क्या टाटा पावर या राज्य सरकार ग्रामीणों के साथ खुली बातचीत करती है। विकास और बिजली ज़रूरी हैं, लेकिन यह मामला याद दिलाता है कि जिन लोगों की ज़मीन पर परियोजना आनी है, उनकी सहमति का सवाल पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स, ग्राउंड रिपोर्ट, द सिटी एक्सप्रेस, The Lens (YouTube)।







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