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Form 7 फैक्ट चेक: 85,854 वोटर ‘ऑटो डिलीट’ हुए? सच या झूठ

Form 7 फैक्ट चेक: क्या यूपी SIR में 85,854 वोटर बिना प्रक्रिया के ऑटो डिलीट हुए और CEO ने माना? हमारी पड़ताल में दावा आधा सच निकला। हर बात के सबूत।

Form 7 फैक्ट चेक: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पोलिंग बूथ पर वोटर आईडी कार्ड दिखाते मतदाताओं की कतार

मुख्य बातें

  • फैसला: आधा सच, दावे का एक हिस्सा सही और बाकी भ्रामक
  • ,854 Form 7 ECI के सॉफ्टवेयर से बने, यह यूपी CEO भी मानते हैं
  • CEO के मुताबिक नाम नोटिस, सुनवाई और ERO के आदेश के बाद ही हटे
  • "ज़्यादातर मुस्लिम वोटर" और "CEO का कबूलनामा" वाले दावे का कोई सबूत नहीं
  • ECI ने अब एक व्यक्ति के लिए 10 Form 7 की सीमा तय की
  • नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 12 नवंबर को, दावे-आपत्तियां 11 दिसंबर तक

Form 7 को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ा दावा तेज़ी से फैल रहा है। X और WhatsApp पर लिखा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में SIR (मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण) के दौरान चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने 85,854 वोटरों के नाम “ऑटो डिलीट” कर दिए, ये ज़्यादातर मुस्लिम वोटर थे और यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने खुद यह बात “कबूल” कर ली है। 19 अक्टूबर की शाम यूपी CEO ने इस पर अलग से “FACT CHECK” जारी किया। तो सच क्या है? हमारी पड़ताल का जवाब है: आधा सच।

सीधी बात यह है कि 85,854 Form 7 सॉफ्टवेयर से बने थे, यह बात दोनों पक्ष मानते हैं। लेकिन “बिना प्रक्रिया के ऑटो डिलीट”, “ज़्यादातर मुस्लिम वोटर” और “CEO ने कबूल किया” वाले हिस्से के पक्ष में कोई सबूत नहीं मिला। आधिकारिक रिकॉर्ड इन बातों का खंडन करता है। नीचे हर दावे को अलग-अलग जांचा गया है।

Form 7 पर वायरल दावा क्या है?

15 अक्टूबर को X पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसे 1.2 लाख से ज़्यादा बार देखा गया। इसमें दावा था कि “यूपी CEO ने माना है कि 85,000 से ज़्यादा फॉर्म ECI ने ऑटो डिलीट किए और ये ज़्यादातर मुस्लिम वोटर थे।” इसके बाद इस मुद्दे पर हिंदी, अंग्रेज़ी, तमिल और मलयालम में कई पोस्ट आईं, जिनमें इसे “वोट चोरी” का सबूत बताया गया। कुछ पोस्ट में यह भी लिखा गया कि फॉर्म में कारण की जगह सिर्फ “A”, “N”, “H” या “E” जैसे अक्षर भरे थे।

हम यहां वायरल पोस्ट का स्क्रीनशॉट नहीं लगा रहे हैं, ताकि गलत दावा और न फैले। नीचे यूपी CEO की वह आधिकारिक पोस्ट है, जिसमें इस दावे को खारिज किया गया है।

फैसला एक नज़र में: क्या सच, क्या झूठ

दावाहमारी पड़तालफैसला
85,854 Form 7 ECI के सॉफ्टवेयर (ERONET) से अपने-आप बनेयूपी CEO की 10 अक्टूबर की प्रेस विज्ञप्ति खुद कहती है कि अनर्ह पाए गए वोटरों के लिए सॉफ्टवेयर में Form 7 जनरेट होता थासच
इन फॉर्म में “कारण” वाला कॉलम खाली थाCEO ने 18 अक्टूबर को X पर लिखा कि सभी EROs की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे सभी फॉर्म में कारण का कॉलम खाली थासच
फॉर्म में कारण की जगह A, N, H, E जैसे अक्षर थेयह The Reporters’ Collective (TRC) की रिपोर्ट का दावा है। CEO का कहना है कि EROs को ऐसा एक भी फॉर्म नहीं मिला और उन्होंने TRC से उदाहरण मांगे हैंविवादित, स्वतंत्र पुष्टि नहीं
बिना नोटिस-सुनवाई के 85,854 नाम “ऑटो डिलीट” हुएCEO के मुताबिक पहले नोटिस, सुनवाई और जांच हुई, ERO ने अनर्ह माना, तब नाम हटा। Form 7 सिर्फ रिकॉर्ड के लिए बनाझूठ (आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार)
ये ज़्यादातर मुस्लिम वोटर थेइसका कोई आंकड़ा या सबूत नहीं मिला। TRC की रिपोर्ट में भी 85,854 फॉर्म के धर्म के आधार पर बंटवारे की बात नहीं हैझूठ / बेबुनियाद
यूपी CEO ने यह सब “कबूल” कियाCEO ने 19 अक्टूबर को लिखा कि ऐसी कोई स्वीकारोक्ति नहीं की गई और यह दावा फेक न्यूज़ पर आधारित हैझूठ

कुल फैसला: आधा सच। संख्या (85,854) और “सॉफ्टवेयर से बने फॉर्म” वाली बात सही है। लेकिन उस पर जोड़ी गई “बिना प्रक्रिया के डिलीट”, “मुस्लिम वोटर” और “CEO का कबूलनामा” वाली बातें या तो आधिकारिक रिकॉर्ड के उलट हैं या उनका कोई सबूत नहीं है।

पूरा मामला कहां से शुरू हुआ

9 अक्टूबर 2026 को खोजी पत्रकारिता संस्था The Reporters’ Collective (TRC) ने एक रिपोर्ट छापी। इसमें कहा गया कि यूपी CEO की वेबसाइट पर मौजूद 4.3 लाख से ज़्यादा Form 7 के डेटा में से करीब 20% फॉर्म खुद विधानसभा स्तर के चुनाव अधिकारियों के नाम से थे और ये ECI के सॉफ्टवेयर ERONET ने अपने-आप बनाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे 85,854 Form 7 में हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं था।

TRC का तर्क है कि कानून के तहत वोटर का नाम हटाने का कारण बताना ज़रूरी है, जैसे मौत, स्थानांतरण, दोहरा नाम या नागरिक न होना। रिपोर्ट में एक अलग बात भी थी: तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में एक ही नाम से सैकड़ों Form 7 भरे गए, जो लगभग पूरी तरह मुस्लिम वोटरों के खिलाफ थे। यानी मुस्लिम वोटरों वाला आरोप “बल्क आपत्तियों” से जुड़ा था, सॉफ्टवेयर वाले 85,854 फॉर्म से नहीं।

यूपी CEO ने क्या कहा

यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के दफ्तर ने 10 अक्टूबर की प्रेस विज्ञप्ति में रिपोर्ट को “भ्रामक एवं निराधार” बताया। उसमें दी गई मुख्य बातें ये हैं:

  • 6 जनवरी 2026 की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 12 करोड़ 55 लाख वोटर थे।
  • इनमें से करीब 3 करोड़ 26 लाख वोटरों को “नो मैपिंग” और तार्किक विसंगतियों की वजह से नोटिस भेजे गए।
  • नोटिस पर सुनवाई और फैसले की आखिरी तारीख 27 मार्च 2026 थी।
  • जिन्हें ERO/AERO ने अनर्ह (Ineligible) माना, उनका नाम ड्राफ्ट सूची से हटाने के लिए सॉफ्टवेयर में Form 7 जनरेट करने की व्यवस्था थी, ताकि भविष्य में पता रहे कि नाम कब और क्यों हटा।
  • 85,854 की संख्या उन्हीं वोटरों की है, जिन्हें स्वतः संज्ञान जांच के बाद अनर्ह माना गया।
  • तरबगंज और पीलीभीत में बल्क में भरे गए सभी Form 7 निरस्त कर दिए गए थे।

13 अक्टूबर को CEO ने X पर दोबारा लिखा कि “85,854 Form 7 स्वतः बनाकर बिना कारण मतदाताओं के नाम हटाने का दावा भ्रामक है। संबंधित मामलों में नोटिस, सुनवाई, जांच और आदेश के बाद कार्रवाई हुई।” यही बात IANS की रिपोर्ट में भी है।

नई दिल्ली में निर्वाचन सदन, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का मुख्यालय। फोटो: Ramesh Lalwani / Wikimedia Commons, CC BY 2.0

तो Form 7 में कारण खाली क्यों था?

यहीं पर मामला उलझता है। 18 अक्टूबर को CEO ने X पर बताया कि सभी EROs की रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई पूरी होने के बाद बने ऐसे सभी Form 7 एक जैसे थे और उनमें कारण वाला कॉलम खाली था। यानी “फॉर्म पर कारण नहीं लिखा था” वाली बात आधिकारिक तौर पर भी सही है।

CEO का पक्ष यह है कि कारण नोटिस और सुनवाई के आदेश में दर्ज था, और Form 7 सिर्फ उस फैसले का रिकॉर्ड था। TRC का पक्ष यह है कि कानून और ECI के SIR नियम फॉर्म पर साफ कारण और “स्पीकिंग ऑर्डर” मांगते हैं। यह कानूनी और प्रक्रिया से जुड़ा सवाल है, जिस पर बहस जायज़ है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि 85,854 नाम बिना किसी जांच के मशीन ने काट दिए।

CEO ने TRC की कुछ और बातों को भी गलत बताया। उनके मुताबिक किसी Form 7 में A, N, H या E जैसे अक्षर नहीं छपे थे, ECINET पर काम के लिए डिजिटल सिग्नेचर ज़रूरी नहीं था, और Form 7 किसी सीनियर के पास मंज़ूरी के लिए नहीं जाता, क्योंकि कानून में फैसला ERO/AERO ही लेते हैं। 19 अक्टूबर को CEO ने TRC से ऐसे फॉर्म के उदाहरण सार्वजनिक करने को कहा। TRC अपनी रिपोर्ट पर कायम है। इन बिंदुओं की हम स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सके।

“मुस्लिम वोटर” और “कबूलनामा” वाला दावा

वायरल पोस्ट का सबसे भड़काऊ हिस्सा यही है। जांच में तीन बातें सामने आईं:

  • 85,854 Form 7 का धर्म के आधार पर कोई आंकड़ा नहीं है। न CEO ने ऐसा कहा, न TRC की रिपोर्ट ने इन फॉर्म को मुस्लिम वोटरों से जोड़ा।
  • बल्क आपत्तियां अलग मामला है। CEO की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक पूरे राज्य में सिर्फ 198 मामले ऐसे मिले, जहां एक व्यक्ति ने 10 से ज़्यादा Form 7 भरे। इनमें कुल 4,740 लोगों के नाम कटवाने की कोशिश हुई। CEO का कहना है कि तरबगंज और पीलीभीत के ऐसे सभी फॉर्म निरस्त हुए।
  • “कबूलनामा” नहीं हुआ। 19 अक्टूबर की रात CEO ने वायरल पोस्ट करने वाली यूज़र को सीधे जवाब दिया कि ऐसी कोई स्वीकारोक्ति नहीं की गई, कोई फॉर्म किसी अधिकारी ने “ऑटो डिलीट” नहीं किया, और मुस्लिम वोटरों वाला दावा बेबुनियाद है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि TRC ने 14 अक्टूबर की अपनी फॉलो-अप रिपोर्ट की हेडलाइन में लिखा कि CEO ने “मुस्लिमों के खिलाफ बड़े पैमाने पर नाम हटाने की कोशिशों” की पुष्टि की। यह उन्हीं बल्क आपत्तियों के बारे में था। यानी सोशल मीडिया पर Form 7 वाले दो अलग मामलों को जोड़कर “कोशिश” को “डिलीट” बना दिया गया और दो अलग आंकड़ों को मिला दिया गया।

ECI ने इसके बाद क्या बदला

CEO के 18 अक्टूबर के X थ्रेड के मुताबिक, मतदाता सूची मैनुअल 2023 में एक व्यक्ति से बल्क में फॉर्म लेने की मनाही थी, पर “बल्क” की सीमा तय नहीं थी। अब ECI ने 9 अक्टूबर 2026 के निर्देश में पूरे पुनरीक्षण के दौरान एक व्यक्ति के लिए 10 फॉर्म की सीमा तय कर दी है। CEO ने यह भी निर्देश दिया है कि Form 7 में गलत जानकारी देने वाले आवेदक पर कानूनी कार्रवाई होगी। यूपी में SIR 10 अप्रैल 2026 को पूरा हो चुका था।

आपके लिए इसका मतलब

अगर आप यूपी के वोटर हैं, तो सबसे काम की बात यह है कि अगला मौका जल्द आ रहा है। CEO की 16 अक्टूबर की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक 1 जनवरी 2027 की अर्हता तिथि पर विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण होगा:

कामतारीख
ड्राफ्ट मतदाता सूची का प्रकाशन12 नवंबर 2026
दावे और आपत्तियां12 नवंबर से 11 दिसंबर 2026
दावों-आपत्तियों का निपटारा28 दिसंबर 2026 तक
अंतिम मतदाता सूची4 जनवरी 2027
  • अपना नाम voters.eci.gov.in या यूपी CEO की वेबसाइट पर EPIC नंबर से चेक करें।
  • नाम नहीं है तो Form 6 भरें। किसी और के नाम पर आपत्ति के लिए Form 7 है, और गलत जानकारी देने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
  • अगर आपको नोटिस मिला है, तो तय समय में दस्तावेज़ जमा करें और सुनवाई में ज़रूर जाएं।
  • किसी स्क्रीनशॉट पर भरोसा करने से पहले CEO या ECI का आधिकारिक हैंडल देखें। हमारी दूसरी फैक्ट-चेक रिपोर्ट में भी यही सबक है: वायरल दावे का एक हिस्सा सच हो सकता है, पूरा नहीं।

हमारी राय (टेकअवे)

यह मामला “पूरा झूठ” नहीं है, इसलिए इसे सिर्फ “फेक” कहकर टालना भी ठीक नहीं। Form 7 पर कारण खाली होने और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवाल असली हैं, और उनका जवाब चुनाव आयोग को देना चाहिए। लेकिन “मशीन ने 85,854 मुस्लिम वोटर काट दिए और CEO ने मान लिया” वाली लाइन तथ्यों पर टिकती नहीं। 2027 की शुरुआत में यूपी में विधानसभा चुनाव होने की उम्मीद है, ऐसे में ऐसे दावे और बढ़ेंगे। चुनाव से जुड़ी हमारी पुरानी कवरेज यहां पढ़ सकते हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी और फेक मैसेज से बचने के लिए CERT-In की यह सलाह भी काम की है।

सरकारी विभागों की भर्तियों और सरकारी योजनाओं की ताज़ा जानकारी के लिए bharathirwanijobs.com देखें।

आपसे सवाल: क्या आपने SIR के बाद अपना नाम वोटर लिस्ट में चेक किया? आपके इलाके में नाम कटने या जुड़ने का अनुभव कैसा रहा? कमेंट में बताएं।

स्रोत

Bharat Hirwani

भरत हिरवानी Timetrolls.in के संस्थापक और संपादक हैं। वे टेक, AI, सरकारी योजनाओं और देश-दुनिया की खबरें आसान हिंदी में, आधिकारिक स्रोतों से जाँचकर लिखते हैं। नौकरी की ताज़ा खबरों के लिए उनकी वेबसाइट bharathirwanijobs.com भी देखें।

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