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SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की वैधता पर फैसला बाकी; अभिषेक बनर्जी ने बंगाल में नए चुनाव की मांग की

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि "लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी" के आधार की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसी टिप्पणी के आधार पर टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने बंगाल में नए चुनाव की मांग की है। भाजपा के जवाब का इंतजार है।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और बंगाल में नए चुनाव की मांग, ग्राफिक
SIR सुनवाई और बंगाल की राजनीति (ग्राफिक: timetrolls.in)

मुख्य बातें

  • दिल्ली की सुनवाई में अदालत ने क्या कहा
  • दिल्ली के 47 लाख नाम और फॉर्म 6 बनाम फॉर्म 8
  • चुनाव आयोग का पक्ष
  • अभिषेक बनर्जी ने क्या लिखा

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पर चल रही कानूनी लड़ाई में बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी। मामला दिल्ली की मतदाता सूची का था, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया कि पश्चिम बंगाल में “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” यानी तार्किक विसंगति के आधार पर जांच की जो अनुमति दी गई थी, वह एक अंतरिम व्यवस्था थी और उसकी वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।

कुछ ही घंटों बाद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी ने इसी टिप्पणी को आधार बनाकर मांग रख दी कि सुप्रीम कोर्ट बंगाल की पिछली निर्वाचित सरकार को बहाल करे और छह महीने के भीतर नए चुनाव कराए। द टेलीग्राफ और इंडिया टुडे ने समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से यह खबर दी है।

दिल्ली की सुनवाई में अदालत ने क्या कहा

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की याचिका सुन रही थी। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने बिहार SIR पर अदालत के पुराने फैसले का हवाला दिया। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि बिहार में आयोग ने लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को श्रेणी के तौर पर इस्तेमाल ही नहीं किया था, इसलिए वह फैसला इस सवाल पर नजीर नहीं बन सकता। उनके शब्द अखबार ने इस तरह छापे हैं:

“We have permitted you in West Bengal as an interim arrangement. We have not finally adjudicated on the legality of logical discrepancy.”

जस्टिस जॉयमाल्य बागची, सुप्रीम कोर्ट, 28 अक्टूबर 2026 (इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार)

यानी अदालत ने बंगाल में यह प्रक्रिया अंतरिम तौर पर चलने दी थी, पर यह तय नहीं किया है कि यह तरीका कानूनी रूप से सही है या नहीं। जस्टिस बागची ने यह सवाल भी उठाया कि जिस व्यक्ति का नाम 2003 की उस सूची में है, जो उस समय के गहन पुनरीक्षण के बाद बनी थी, उसकी एंट्री अब “विसंगति” बताकर दोबारा कैसे खोली जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत को देखना होगा कि सॉफ्टवेयर से बने “पैटर्न” के आधार पर नोटिस भेजना किसी इंसान के विवेक से लिया गया फैसला माना जा सकता है या नहीं।

इसी सुनवाई में एक और बात अहम रही, जिसे राजनीतिक बयानों में अक्सर छोड़ दिया जाता है। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत की ये टिप्पणियां अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं और संवेदनशील मामलों में अदालती कार्यवाही को संदर्भ से हटाकर छापने से पूरी बहस खिंच जाती है। यह बात आगे की राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए जरूरी है।

दिल्ली के 47 लाख नाम और फॉर्म 6 बनाम फॉर्म 8

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक 31 अगस्त को जारी दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 1.45 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 47.57 लाख नाम बाहर रह गए थे। इन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी एंट्री की श्रेणी में रखा गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि ड्राफ्ट सूची के करीब 19.34 लाख मतदाताओं को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के आधार पर नोटिस गए, जबकि आयोग ने कहीं यह परिभाषित नहीं किया कि वह किसे विसंगति मानता है।

बेंच की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि जो लोग 2026 की सूची में दर्ज थे और बाद में घर बदल चुके हैं, उनसे नए मतदाता वाला फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है, जबकि पता बदलने के लिए फॉर्म 8 बना है। मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली जैसे महानगर की बदलती आबादी, दिहाड़ी मजदूरों और रेहड़ी-पटरी वालों का उदाहरण दिया और आयोग से कहा कि मतदाताओं पर बोझ डालने के बजाय आयोग खुद उन तक पहुंचे।

चुनाव आयोग का पक्ष

आयोग के वकील डी.एस. नायडू ने अदालत में कहा कि यह नए सिरे से किया जा रहा पुनरीक्षण है, जागरूकता शिविर लगाए गए हैं और बीएलओ व बूथ लेवल एजेंट मतदाताओं तक पहुंचे हैं। इंडिया टुडे के अनुसार उन्होंने याचिकाकर्ताओं पर “scary picture that doesn’t exist” यानी ऐसी डरावनी तस्वीर पेश करने की बात कही जो असल में है ही नहीं। आयोग ने मौखिक भरोसा दिया कि 30 अक्टूबर की दावा-आपत्ति की समयसीमा बढ़ाई जाएगी। अदालत ने कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया, बल्कि आयोग से खुद कदम उठाने की अपेक्षा जताई और मामला दो हफ्ते बाद फिर सुनने को कहा। द हिंदू ने भी समयसीमा बढ़ाने और नामांकन आसान करने के सुझावों की जानकारी दी है।

अभिषेक बनर्जी ने क्या लिखा

अदालत की टिप्पणी पर आई एक रिपोर्ट को साझा करते हुए अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर अंग्रेजी में लिखा, जिसे टेलीग्राफ और इंडिया टुडे ने छापा है:

“What a convenient democracy! If a manipulated mandate can produce a full-fledged government, what remains of electoral legitimacy? By this logic, the present State Government should be treated as INTERIM.”

अभिषेक बनर्जी, टीएमसी सांसद, सोशल मीडिया पोस्ट

आगे उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट को बंगाल में पिछली निर्वाचित सरकार बहाल करनी चाहिए, छह महीने में नए चुनाव कराने चाहिए और गलत तरीके से सूची से बाहर हुए हर पात्र मतदाता का नाम वापस जोड़ना चाहिए। उनका तर्क सीधा है: अगर बंगाल में यह जांच सिर्फ अंतरिम व्यवस्था थी, तो उसी सूची से बनी सरकार को भी अंतरिम माना जाए। यह उनका राजनीतिक आरोप और व्याख्या है; अदालत ने ऐसी कोई बात नहीं कही है।

दूसरा पक्ष: भाजपा का जवाब अभी नहीं

इस खबर के लिखे जाने तक पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार या भाजपा प्रदेश नेतृत्व की ओर से अभिषेक बनर्जी की मांग पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया हमें किसी विश्वसनीय रिपोर्ट में नहीं मिली। भाजपा के जवाब का इंतजार है; प्रतिक्रिया आने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा। चुनाव आयोग ने अदालत के बाहर इस मांग पर कोई बयान नहीं दिया है।

यह मांग कानूनी तौर पर कितनी दूर तक जा सकती है

संवैधानिक ढांचे में किसी चुनी हुई सरकार को हटाकर पुरानी सरकार बहाल करना असाधारण कदम होगा। चुनाव नतीजों को चुनौती देने का सामान्य रास्ता चुनाव याचिका है, जो संबंधित हाईकोर्ट में दायर होती है। मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाना और पूरे जनादेश को रद्द करने की मांग करना, दोनों अलग बातें हैं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की वैधता अभी जांच के दायरे में है, विपक्ष को एक कानूनी आधार देता है, जिस पर वह आगे भी सवाल उठाता रहेगा।

यह भी ध्यान रखना होगा कि अदालत ने अभी किसी प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया है। उसने सिर्फ इतना कहा है कि यह सवाल खुला है। अगर आगे चलकर अदालत इस श्रेणी को गलत मानती है, तो उसका असर सिर्फ बंगाल नहीं, बल्कि उन सभी राज्यों पर पड़ सकता है जहां SIR के दूसरे और तीसरे चरण में यह तरीका अपनाया गया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार तीसरे चरण में विसंगति की श्रेणियां छह से बढ़कर 11 हो गई थीं।

1 नवंबर की रैली से पहले बढ़ा तापमान

SIR को लेकर विपक्ष पहले से आक्रामक है। INDIA गठबंधन 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में “वोट बचाओ, देश बचाओ” रैली करने जा रहा है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग प्रमुख है। इससे पहले पंजाब विधानसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव और दिल्ली में चुनाव आयोग तक मार्च जैसी घटनाएं हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी अब इस रैली के भाषणों में भी दोहराई जा सकती है, जबकि भाजपा का कहना रहा है कि मतदाता सूची की सफाई जरूरी है और विपक्ष हार का दोष संस्थाओं पर डाल रहा है।

आम मतदाता के लिए सबसे काम की बात दिल्ली से जुड़ी है। जिनका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, उनके लिए दावा-आपत्ति का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है और आयोग ने समयसीमा बढ़ाने का भरोसा दिया है। जिन लोगों ने सिर्फ घर बदला है, वे अदालत की टिप्पणी के बाद फॉर्म 8 को लेकर आयोग के नए निर्देशों पर नजर रखें। अगली सुनवाई में आयोग को बताना है कि उसने क्या कदम उठाए।

इस पूरे मामले को समझाने वाला एक वीडियो नीचे देखा जा सकता है:

वीडियो स्रोत: Grundnorm Law (YouTube) | मूल वीडियो देखें

इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: The Indian Express, India Today, India Today (PTI), The Telegraph (PTI), The New Indian Express, The Hindu।

Bharat Hirwani

भरत हिरवानी TimeTrolls के संस्थापक और संपादक हैं। वे B.Tech (मैकेनिकल) और MBA (ऑपरेशंस) हैं और 4+ साल से इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। TimeTrolls पर वे देश, खेल, टेक और रोज़गार से जुड़ी खबरें तथ्यों की जांच के बाद सरल हिंदी में प्रकाशित करते हैं।

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