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‘नहीं बेचेंगे तो लिख के दें’: भिलाई स्टील प्लांट पर भूपेश बघेल ने भाजपा सरकार से क्या मांगा

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 22 अक्टूबर को रायपुर में कहा कि अगर सरकार भिलाई स्टील प्लांट नहीं बेचेगी तो लिखकर दे। उन्होंने कोयला खदान से गैस पाइपलाइन तक अडानी से जुड़ी एक ‘चेन’ गिनाई, जबकि इस्पात मंत्रालय बिक्री की खबरों को गलत बता चुका है।

भूपेश बघेल और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की तस्वीरें, बीच में VS और भिलाई स्टील प्लांट पर बघेल का बयान ‘नहीं बेचेंगे तो लिख के दें’
फोटो: Wikimedia Commons (भूपेश बघेल: Domino786, CC0; विष्णुदेव साय: Prime Minister's Office, GODL-India)

मुख्य बातें

  • बघेल ने क्या कहा: कोयले से स्टील तक की ‘चेन’
  • शंका की वजह: BALCO, FSNL और प्लांट के भीतर की यूनिट्स
  • गैस पाइपलाइन और Jio की मिसाल
  • सरकार और भाजपा का पक्ष

भिलाई स्टील प्लांट को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत में चल रही खींचतान अब एक सीधी मांग पर आ टिकी है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 22 अक्टूबर 2026 को रायपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि अगर सरकार दावा कर रही है कि प्लांट नहीं बिकेगा, तो वह यह बात लिखकर दे। उनके शब्द थे, “यदि ये कह रहे हैं कि हम नहीं बेचेंगे, लिख के दें हम नहीं बेचेंगे। हमें खुशी होगी, भिलाई स्टील प्लांट ना बिके।”

यह बयान ऐसे समय आया है जब इस्पात मंत्रालय और BSP प्रबंधन दोनों बिक्री की खबरों को गलत बता चुके हैं। यानी आधिकारिक तौर पर सरकार का रुख साफ है, लेकिन बघेल उस खंडन को काफी नहीं मान रहे। उनका तर्क है कि जिस सरकार के दौर में सार्वजनिक संपत्तियां एक-एक कर निजी हाथों में गई हैं, उसके मौखिक भरोसे पर यकीन करना मुश्किल है।

वीडियो स्रोत: The Lens (YouTube) | मूल वीडियो देखें

बघेल ने क्या कहा: कोयले से स्टील तक की ‘चेन’

The Lens के वीडियो में बघेल का अंदाज़ किसी एक आरोप तक सीमित नहीं दिखता। वे एक कड़ी से दूसरी कड़ी जोड़ते हुए अपनी बात रखते हैं, लगभग उसी तरह जैसे कोई वकील अदालत में घटनाओं का सिलसिला सामने रखता है। उन्होंने याद दिलाया कि पहले राजस्थान को कोयला आवंटित हुआ और अडानी ने पावर प्लांट लगा लिया, फिर रायगढ़ और रायखेड़ा में भी यही हुआ, और बाद में ACC जामुल का सीमेंट प्लांट भी खरीद लिया गया।

इसके बाद वे दंतेवाड़ा के बैलाडीला पहुंचे। बघेल के मुताबिक रमन सिंह सरकार के समय वहां की लौह अयस्क खदान छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को मिली, जिसने NMDC के साथ जॉइंट वेंचर बनाया और फिर अडानी को उसमें MDO (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) नियुक्त कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने फर्जी ग्राम सभा की जांच कराकर उसे निरस्त कराया था, लेकिन अब नंदराज पहाड़ में पेड़ कटाई शुरू होने की खबरें आ रही हैं। इसी कड़ी के आखिर में उनका सवाल था, “लोहा खदान मिल जाएगा तो उसको स्टील प्लांट चाहिए कि नहीं चाहिए?”

यह सवाल ही उनके पूरे तर्क की धुरी है। बघेल यह दावा नहीं कर रहे कि बिक्री का कोई दस्तावेज़ उनके पास है; वे एक पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं और उसी के आधार पर शंका जता रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उजागर क्यों किए? ताकि भिलाई स्टील प्लांट बच जाए।”

शंका की वजह: BALCO, FSNL और प्लांट के भीतर की यूनिट्स

अपनी आशंका को वज़न देने के लिए बघेल ने पुराने उदाहरण गिनाए। उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार ने पहले बालको को बेचा।” कोरबा स्थित BALCO की 51 फीसदी हिस्सेदारी 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान स्टरलाइट (अब वेदांता समूह) को बेची गई थी, और छत्तीसगढ़ में यह फैसला आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है।

फिर उन्होंने भिलाई की ओर रुख किया। BSP से जुड़ी फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) का विनिवेश हो चुका है, और बघेल के मुताबिक प्लांट के भीतर भी कई यूनिट्स बाहर जा चुकी हैं: “भिलाई के अंदर में ही भाजपा सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट बेच दिया, पावर प्लांट बेच दिया, सिंटर प्लांट बेच दिया, तो सब तो बेच-बेच रहे हैं।” बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां नोटिफिकेशन हो चुका है और “नगरनार बिकने कगार पे है।”

गैस पाइपलाइन और Jio की मिसाल

विवाद की एक कड़ी गैस पाइपलाइन MoU भी है। नवभारत लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक अडानी टोटल गैस ने BSP के साथ प्लांट, कैंटीन और आसपास के घरों में पाइप्ड नेचुरल गैस की सप्लाई के लिए समझौता किया है, और उद्योग समूह की टीम इसी व्यवस्था के सिलसिले में BSP आने वाली थी। बघेल इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखे। उन्होंने पूछा कि अडानी डोंगरगढ़ या रायपुर जैसे शहर क्यों नहीं गए, भिलाई ही क्यों, और साथ ही सवाल किया, “गैस पाइप अडानी को क्यों जाना चाहिए?”

यहीं उनका तंज़ सबसे तीखा दिखा। उन्होंने Jio का उदाहरण दिया और कहा, “हमारे प्रधानमंत्री ब्रांड एंबेसडर बने अंबानी का।” उनके मुताबिक पहले मुफ्त सिम बांटकर बाकी कंपनियों के ग्राहक खींचे गए और अब “आज सबसे महंगा प्लान है उसका।” इसी तर्ज़ पर उन्होंने गैस कारोबार को लेकर चेताया कि शुरू में सस्ता कनेक्शन मिलेगा, लेकिन “जब उसमें पूरी तरह निर्भर हो जाएंगे तो फिर गैस की कीमतें बढ़ाएगा, आप कुछ नहीं कर पाएंगे।”

बघेल का यह अंदाज़ आक्रामक भी है और व्यंग्य भरा भी। वे ठेठ बोलचाल की भाषा में, सवाल पूछते हुए और श्रोताओं से “सुनते जाइए” कहते हुए बात आगे बढ़ाते हैं। यह शैली प्रेस कॉन्फ्रेंस को भाषण जैसा बना देती है, और शायद यही वजह है कि यह बयान सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैला।

सरकार और भाजपा का पक्ष

पत्रिका के मुताबिक इस्पात मंत्रालय ने 18 अक्टूबर को X पर पोस्ट कर BSP की बिक्री से जुड़े दावों को गलत बताया था। दैनिक भास्कर के अनुसार उसी दिन BSP प्रबंधन ने भी बयान जारी कर निजीकरण की खबरों को झूठा और भ्रामक कहा और लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने की अपील की।

भाजपा विधायक रिकेश सेन ने कांग्रेस नेताओं को चुनौती दी थी कि अगर उनके पास BSP को अडानी या किसी निजी कंपनी को बेचने से जुड़े दस्तावेज़ हैं तो उन्हें सार्वजनिक करें। उन्होंने भूपेश बघेल और भिलाई नगर के कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव के घर के बाहर धरना देने की बात भी कही थी। भाजपा ने सोशल मीडिया पर पोस्टर जारी कर बघेल पर निशाना भी साधा। जवाब में बघेल ने कहा कि धरना देना है तो प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने दें। 22 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मांगी गई ‘लिखित गारंटी’ पर भाजपा या राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की ओर से अलग से कोई प्रतिक्रिया इस खबर के लिखे जाने तक सामने नहीं आई है।

दैनिक भास्कर से बातचीत में बघेल ने यह सवाल भी उठाया था कि BSP के जनसंपर्क विभाग को बिक्री की खबरों का खंडन करने का अधिकार किसने दिया, क्योंकि बिक्री का फैसला भारत सरकार करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि अडानी समूह की नज़र BSP की रेल मिल पर है।

भिलाई स्टील प्लांट इतना संवेदनशील मुद्दा क्यों है

भिलाई स्टील प्लांट सोवियत संघ के सहयोग से बना था और 1959 में यहां पहली ब्लास्ट फर्नेस शुरू हुई। आज यह महारत्न कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) का हिस्सा है और रेलवे के लिए पटरियां बनाने वाले देश के प्रमुख संयंत्रों में गिना जाता है। भिलाई शहर की पहचान ही इस प्लांट से बनी है, इसलिए यहां ‘बिक्री’ शब्द भर से हज़ारों परिवारों में बेचैनी फैल जाती है।

सरकार की तरफ से यह भी बताया जाता रहा है कि BSP के विस्तार पर भारी निवेश हो रहा है। नवभारत लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र और SAIL करीब 31 हज़ार करोड़ रुपये के विस्तार पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर, मज़दूर संगठन लंबे समय से ठेका प्रथा और सहायक यूनिट्स के निजीकरण पर चिंता जताते रहे हैं। यही दो तस्वीरें इस बहस को उलझा देती हैं: एक तरफ विस्तार का दावा, दूसरी तरफ टुकड़ों में हो रहे विनिवेश की शिकायत।

असल सवाल: भरोसा या सबूत

इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों की मांग एक-दूसरे का आईना है। भाजपा कह रही है कि बघेल सबूत दिखाएं, और बघेल कह रहे हैं कि सरकार लिखकर भरोसा दे। फिलहाल अडानी समूह के BSP दौरे और बिक्री की किसी योजना के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, जबकि मंत्रालय का खंडन रिकॉर्ड पर है। लेकिन BALCO, FSNL और नगरनार जैसे उदाहरणों की वजह से छत्तीसगढ़ में ऐसे खंडनों पर संदेह की गुंजाइश बनी रहती है, और विपक्ष इसी गुंजाइश को राजनीतिक मुद्दा बना रहा है।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या केंद्र या SAIL कोई औपचारिक, विस्तृत बयान देकर इस बहस को खत्म करते हैं, या फिर भिलाई स्टील प्लांट का मुद्दा छत्तीसगढ़ की राजनीति में लंबे समय तक गूंजता रहेगा। TimeTrolls इस खबर पर नज़र बनाए हुए है।

Bharat Hirwani

भरत हिरवानी Timetrolls.in के संस्थापक और संपादक हैं। वे टेक, AI, सरकारी योजनाओं और देश-दुनिया की खबरें आसान हिंदी में, आधिकारिक स्रोतों से जाँचकर लिखते हैं। नौकरी की ताज़ा खबरों के लिए उनकी वेबसाइट bharathirwanijobs.com भी देखें।

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