मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दिल्ली में चल रहा आंदोलन शुक्रवार, 23 अक्टूबर को एक और पड़ाव पर पहुंचा। ‘People Against SIR’ की दिल्ली समन्वय समिति ने चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च का आह्वान किया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को अशोका रोड पर ही रोक दिया और चेतावनी के बाद कई लोगों को हिरासत में ले लिया। SIR विरोध मार्च में शामिल लोग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और उन पर मुकदमा चलाने की मांग कर रहे थे।
यह आंदोलन इस महीने की शुरुआत से चल रहा है। TimeTrolls ने 20 अक्टूबर को बताया था कि जंतर-मंतर मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास की हिरासत बढ़ाई गई थी और ममता बनर्जी ने उनकी रिहाई की मांग की थी (पढ़ें: ममता बनर्जी ने मांगी CJP नेताओं की रिहाई, 2 दिन बढ़ी हिरासत)। शुक्रवार का मार्च उसी आंदोलन का नया अध्याय है, जिसमें अब किसान संगठन, छात्र संगठन और वाम दल भी खुलकर साथ दिख रहे हैं।
गोल डाक खाना से अशोका रोड तक: दिन भर का घटनाक्रम
द हिंदू की लाइव कवरेज के मुताबिक मार्च कालीबाड़ी मार्ग और भाई वीर सिंह मार्ग के चौराहे पर गोल डाक खाना के पास से शुरू हुआ। प्रदर्शनकारी चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर बढ़ना चाहते थे। आयोजकों ने किसानों, मज़दूरों, युवाओं और महिलाओं से तिरंगा लेकर मार्च में शामिल होने की अपील की थी।
- दोपहर से पहले दिल्ली पुलिस ने ट्रैफिक एडवाइज़री जारी कर बंगला साहिब गुरुद्वारा और जंतर-मंतर के पास दोपहर 1 से शाम 5 बजे तक डायवर्ज़न की जानकारी दी।
- बंगला साहिब गुरुद्वारा के पास बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस और RAF के जवान तैनात किए गए।
- अशोका रोड पर रोके जाने के बाद प्रदर्शनकारी वहीं बैठ गए और आयोजकों की घोषणा के मुताबिक ‘जन संसद’ (People’s Parliament) लगाई।
- पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली करने की चेतावनी दी और फिर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर पुलिस वैन से ले जाया गया।
PTI के हवाले से द हिंदू ने एक प्रदर्शनकारी का बयान दर्ज किया: “This is not about reclaiming Jantar Mantar; this is about saving democracy and the country.” यानी, “यह जंतर-मंतर वापस लेने की बात नहीं है; यह लोकतंत्र और देश को बचाने की बात है।” क्रांतिकारी युवा संगठन (KYS) और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने भी मार्च को समर्थन दिया, और दिल्ली के साथ हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी कार्यकर्ता पहुंचे।
बृंदा करात का ‘पीस बॉन्ड’ तंज
मार्च में शामिल CPI(M) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात का बयान दिन की सबसे चर्चित टिप्पणी रहा। द हिंदू के अनुसार उन्होंने कहा:
Let the Modi government sign a peace bond that it will stop the attack on the right to vote, stop the attack on the Constitution, stop SIR, and ensure the resignation of Gyanesh Kumar.
बृंदा करात, CPI(M), द हिंदू के हवाले से
यानी, “मोदी सरकार एक पीस बॉन्ड भरे कि वह वोट के अधिकार पर हमला बंद करेगी, संविधान पर हमला बंद करेगी, SIR रोकेगी और ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा सुनिश्चित करेगी।” इस तंज का संदर्भ समझना ज़रूरी है। TimeTrolls की 20 अक्टूबर की रिपोर्ट में बताया गया था कि मजिस्ट्रेट ने CJP नेताओं पर 11 अक्टूबर को भरा गया शांति बॉन्ड ‘जानबूझकर’ तोड़ने की बात कही थी। करात ने उसी ‘पीस बॉन्ड’ शब्द को पलटकर सरकार पर लागू कर दिया।
CJP के आशुतोष रांका ने क्राइम ब्रांच के नोटिस पर कहा कि वे जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं। उनके मुताबिक पिछली तारीख पर वे नहीं पहुंच सके थे और इसकी जानकारी दे दी गई थी; क्राइम ब्रांच ने समय की पुष्टि करने को कहा है।
शुक्रवार को ही रांका और दास अपने खिलाफ दर्ज अलग-अलग मामलों में मंदिर मार्ग थाने में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए। बाहर निकलकर रांका ने PTI से कहा, “The movement continues… The movement continues even when we are in jail.” यानी आंदोलन जारी है, जेल में रहते हुए भी जारी रहता है। दास ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना ही होगा। रांका के मुताबिक अगले कदमों का ऐलान तय होने के बाद किया जाएगा।
सुरक्षा का दायरा: 273 CAPF कंपनियां 31 अक्टूबर तक
इसी दिन यह भी सामने आया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 273 कंपनियों की तैनाती दूसरी बार बढ़ाकर 31 अक्टूबर तक कर दी है। PTI के हवाले से द हिंदू के अनुसार आधिकारिक सूत्रों ने इसकी वजह राजनीतिक और अन्य समूहों के संभावित “flash protests” बताई। ये कंपनियां इस महीने की शुरुआत में CJP के प्रदर्शनों के लिए दिल्ली लाई गई थीं। इतनी बड़ी तैनाती अपने आप में बताती है कि सरकार इस आंदोलन को कितनी गंभीरता से ले रही है।
अंतरराष्ट्रीय नज़र: UN विशेषज्ञों की अपील
यह आंदोलन अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा में भी है। अल जज़ीरा के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के करीब दो दर्जन स्वतंत्र विशेषज्ञों ने मंगलवार, 20 अक्टूबर को बयान जारी कर भारत सरकार से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ “excessive force” यानी अत्यधिक बल का इस्तेमाल बंद करने और अधिकारियों के आचरण की निष्पक्ष जांच की मांग की। विशेषज्ञों ने कहा कि अहिंसक सभाओं के बावजूद लाठीचार्ज जैसे बल प्रयोग की खबरें हैं और हज़ारों लोगों को प्रदर्शनों में शामिल होने से रोका गया। उन्होंने हिरासत के दौरान यौन हिंसा और लिंग-आधारित दुर्व्यवहार की खबरों पर खास चिंता जताई और व्यापक सभा प्रतिबंध हटाने की अपील की।
भारत ऐसी आलोचनाओं को बार-बार अपने आंतरिक मामलों में दखल बताकर खारिज करता रहा है, और अल जज़ीरा के अनुसार इस महीने की शुरुआत में UN मानवाधिकार कार्यालय की चिंता पर भी यही रुख रहा।
चुनाव आयोग का पक्ष
प्रदर्शनकारी समूहों का आरोप है कि मतदाता सूची से 13 करोड़ (130 मिलियन) नाम हटाए गए और इसका असर गरीबों, बेघरों और मुसलमानों समेत अल्पसंख्यकों पर ज़्यादा पड़ा। भाजपा और चुनाव आयोग इन आरोपों को नकारते हैं। आयोग का कहना है कि वह डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित और अन्य अयोग्य मतदाताओं के नाम हटा रहा है और जिनका नाम गलती से हटा है, वे अपील कर सकते हैं। शुक्रवार के मार्च और हिरासत पर आयोग या दिल्ली पुलिस का कोई अलग विस्तृत बयान उपलब्ध रिपोर्टिंग में नहीं है।
आंदोलन की दिशा अब इस पर निर्भर करेगी कि अपीलों की प्रक्रिया कितनी तेज़ और पारदर्शी रहती है, और क्या सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत का कोई रास्ता खुलता है। CJP नेताओं ने साफ कहा है कि आंदोलन जारी रहेगा, जबकि 31 अक्टूबर तक बढ़ी सुरक्षा तैनाती बताती है कि सरकार भी लंबी खींचतान के लिए तैयार है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: द हिंदू, अल जज़ीरा।







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