प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 8 नवंबर 2026 को दीपावली छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बलों के जवानों के साथ मनाई। जगदलपुर के पास करनपुर स्थित सीआरपीएफ के कोबरा ऑपरेशंस बेस पर जवानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हथियारबंद नक्सली जंगलों से खत्म हो गए हैं, लेकिन “दिमागी नक्सलियों” ने कई संगठनों पर कब्जा कर रखा है और कई राजनीतिक दलों में घुसपैठ कर ली है। कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने X पर इस बयान पर आपत्ति जताई और कहा कि प्रधानमंत्री ने एक गैर-राजनीतिक मौके पर, सुरक्षा बलों की वर्दी पहनकर, अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला किया।
यह दौरा इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 को देश को नक्सलवाद से मुक्त घोषित किया था और यह उसके बाद की पहली दीपावली थी। प्रधानमंत्री 2014 से हर साल दीपावली सेना या सुरक्षा बलों के बीच मनाते आए हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह उनकी पहली दीपावली थी।
करनपुर कैंप में प्रधानमंत्री ने क्या कहा
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के मुताबिक करनपुर का कोबरा बेस बस्तर और अबूझमाड़ में नक्सल-विरोधी अभियानों का प्रशिक्षण केंद्र और लॉन्च पैड रहा है। यहां प्रधानमंत्री ने जवानों को मिठाई बांटी, शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी और अपने संबोधन में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का पूरा ब्योरा रखा। PMO इंडिया के X हैंडल पर साझा किए गए उनके शब्द थे:
ये पहली दीवाली है- जब देश का हर जिला नक्सलवाद से मुक्त है। ये पहली दीवाली है- जब करोड़ों देशवासी नक्सलवाद के भय को परास्त कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PMO इंडिया के X पोस्ट से)
उन्होंने याद दिलाया कि एक समय करीब 20 राज्यों के 230 से ज्यादा जिले वामपंथी उग्रवाद की चपेट में थे, हर साल दो हजार तक नक्सली हमले होते थे और अकेले छत्तीसगढ़ में एक हजार से ज्यादा जवानों का बलिदान हुआ। 2010 में दंतेवाड़ा में 76 सुरक्षाकर्मियों और एक अलग घटना में 44 नागरिकों की मौत का भी उन्होंने ज़िक्र किया। प्रधानमंत्री के मुताबिक 2004 से 2013 के बीच हर साल मारे जाने वाले नक्सलियों से ज्यादा जवान शहीद होते थे और तब की सरकारों ने नक्सलवाद को लाइलाज बीमारी मानकर छोड़ दिया था। इसी हिस्से में उन्होंने “महलों में रहने वाले नामदार” का ज़िक्र करते हुए विपक्ष पर सीधा निशाना भी साधा।
सरकार की उपलब्धि के तौर पर उन्होंने कहा कि 47 साल में पहली बार पिछले एक साल में ड्यूटी के दौरान सीआरपीएफ के किसी जवान की जान नहीं गई। उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में 15,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें, 9,500 से ज्यादा मोबाइल टावर, करीब 175 एकलव्य स्कूल और लगभग 50 आईटीआई बनने की बात कही। विश्व बैंक की रिपोर्ट का हवाला देकर उन्होंने 50 करोड़ लोगों के अत्यधिक गरीबी से बाहर आने का दावा भी दोहराया। बस्तर ओलंपिक का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “आज इसी बस्तर में ओलंपिक हो रहा है। बच्चे बंदूक नहीं स्पोर्ट्स में हाथ आजमा रहे हैं।”
“दिमागी नक्सली” वाला हिस्सा
विवाद भाषण के उस हिस्से पर है जिसमें प्रधानमंत्री ने उपलब्धियां गिनाने के बाद चेतावनी दी। टीवी चैनलों पर प्रसारित भाषण के वीडियो में उनके शब्द इस तरह सुने जा सकते हैं:
नक्सली खत्म हुए हैं। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। जंगलों से हथियारी नक्सली तो मिट गए लेकिन दिमागी नक्सलियों ने कई संगठनों पर कब्जा कर रखा है। यह आज भी देश के संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ लोगों को उकसा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, करनपुर (बस्तर), 8 नवंबर 2026
इसके आगे उन्होंने कहा कि कई राजनीतिक दलों और अलग-अलग संगठनों में इन “दिमागी नक्सलियों” ने घुसपैठ कर ली है, और “हमें इन्हें पहचानना है। इन्हें परास्त करना है और देश को सुरक्षित करना है।” प्रधानमंत्री ने किसी दल या नेता का नाम नहीं लिया। दिलचस्प बात यह है कि PMO की वेबसाइट पर जारी आधिकारिक अंग्रेज़ी विज्ञप्ति में भाषण के इस हिस्से का उल्लेख नहीं है, हालांकि भाषण के वीडियो और द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी इंडिया व लाइव हिंदुस्तान जैसी रिपोर्टों में यह हिस्सा दर्ज है।
जयराम रमेश की आपत्ति
कांग्रेस की ओर से सबसे पहले प्रतिक्रिया जयराम रमेश की आई, जो पार्टी के संचार प्रभारी महासचिव और राज्यसभा सांसद हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिंदू के मुताबिक उन्होंने X पर अंग्रेज़ी में लिखा कि प्रधानमंत्री ने दीपावली के दिन भी देश को अपनी “ट्रेडमार्क” भाषा से नहीं बख्शा। उनकी पोस्ट का हिंदी अनुवाद इस तरह है:
उन्होंने एक बार फिर उस शब्द का इस्तेमाल किया है जिसे वे “दिमागी नक्सली” कहते हैं। उन्होंने एक बहुत गंभीर, गैर-राजनीतिक मौके का इस्तेमाल किया, सुरक्षा बलों की वर्दी पहनी और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर अपशब्दों की बौछार की। यह सभी संस्थागत मर्यादाओं पर खुला हमला है।
जयराम रमेश, कांग्रेस महासचिव (X पोस्ट, अंग्रेज़ी से अनुवाद)
रमेश ने अपनी बात के समर्थन में दो पुराने उदाहरण गिनाए। उनके मुताबिक 28 अप्रैल 2024 को प्रधानमंत्री ने जाति जनगणना की मांग करने वालों को “अर्बन नक्सल” कहा था, लेकिन 30 अप्रैल 2025 को सरकार ने जनगणना 2027 में जातिगत गणना कराने का ऐलान किया। इसी तरह सितंबर 2020 में तीन कृषि कानूनों का विरोध करने वालों को नक्सली विचारधारा का समर्थक बताया गया और 19 नवंबर 2021 को वही कानून वापस ले लिए गए। पोस्ट के आखिर में उन्होंने प्रधानमंत्री को “हताश, परेशान और बेचैन” बताते हुए लिखा कि उनके “झोला उठाने” का समय तेजी से करीब आ रहा है (प्रभासाक्षी/भाषा के हिंदी अनुवाद के अनुसार)।
भाजपा या सरकार की ओर से जयराम रमेश की आज की पोस्ट पर कोई औपचारिक जवाब इस खबर के लिखे जाने तक सामने नहीं आया था; जवाब का इंतज़ार है। हालांकि अगस्त में जब यह शब्द पहली बार चर्चा में आया था, तब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई दी थी कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं को “दिमागी नक्सली” नहीं कहा। एएनआई के मुताबिक रिजिजू ने कहा था कि यह शब्द उन लोगों के लिए है जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों के साथ खड़े हैं या पूर्वोत्तर को देश से काटने की बात करते हैं।
यह शब्द पहली बार नहीं आया
“दिमागी नक्सली” शब्द को लेकर राजनीतिक बहस पिछले तीन महीने से चल रही है। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में भी कहा था कि हथियारबंद नक्सलवाद को खत्म करने में देश सफल रहा है, लेकिन उसकी विचारधारा के समर्थक हिंसा को बढ़ावा देने के मौके तलाश रहे हैं। उस समय की प्रतिक्रियाएं इस तरह थीं:
- कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने पलटवार में खुद के “दिमागी नक्सली” होने पर गर्व की बात कही थी (दैनिक जागरण)।
- कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 22 अगस्त को कलबुर्गी में कहा था कि सरकार इस शब्द की जगह रोज़गार, महंगाई और निवेश पर बात करे (मनीकंट्रोल/एएनआई)।
- छत्तीसगढ़ में उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और अरुण साव ने प्रधानमंत्री के बयान का समर्थन किया था, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने “अर्बन नक्सल” के बाद “दिमागी नक्सलवाद” की अवधारणा पर सवाल उठाए थे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने युवाओं को बदनाम करने का आरोप लगाया था (दैनिक जागरण, 20 अगस्त 2026)।
यानी रविवार का बयान नया शब्द नहीं, बल्कि उसी बहस की अगली कड़ी है। फर्क यह है कि इस बार यह बात बस्तर की ज़मीन से और दीपावली के मौके पर जवानों के बीच कही गई, और कांग्रेस की आपत्ति भी मुख्य रूप से इसी मौके और मंच को लेकर है।
छत्तीसगढ़ के लिए इस दौरे का मतलब
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री की X पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए उनका स्वागत किया और लिखा कि बस्तर भय और हिंसा के माहौल से निकलकर शांति, विश्वास और विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है (आईएएनएस)। उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने कवर्धा में कहा कि प्रधानमंत्री ने अचानक बस्तर दौरे की योजना बनाई और दीपावली पर जवानों के बीच उनका पहुंचना जवानों के लिए विशेष महत्व रखता है (ईटीवी भारत)।
राजनीतिक तौर पर देखें तो छत्तीसगढ़ में इन दिनों भाजपा “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” पदयात्राओं के ज़रिए कांग्रेस पर हमलावर है, और कांग्रेस SIR व मतदाता सूची के मुद्दे पर “वोट बचाओ, देश बचाओ” अभियान चला रही है। ऐसे माहौल में बस्तर से आया यह बयान प्रदेश की राजनीति में भी नई बहस छेड़ सकता है। बस्तर में नक्सलवाद खत्म होने के बाद नेताओं की सुरक्षा घटाने के फैसले पर टाइम ट्रोल्स की पिछली रिपोर्ट भी पढ़ी जा सकती है।
आगे क्या
“दिमागी नक्सली” शब्द पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की बयानबाजी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। कांग्रेस पहले से ही मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ देशव्यापी अभियान चला रही है, और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने रविवार को ही कहा कि यह आंदोलन दीपावली के छोटे विराम के बाद फिर तेज होगा। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं या भाजपा की ओर से रविवार के बयान पर कोई नई प्रतिक्रिया आने पर यह खबर अपडेट की जाएगी।
रिपोर्ट के आधार: प्रधानमंत्री कार्यालय (आधिकारिक विज्ञप्ति), PMO इंडिया का X हैंडल, द हिंदू, द हिंदू (कांग्रेस प्रतिक्रिया), इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी इंडिया, IBC24, प्रभासाक्षी (सभी 8 नवंबर 2026); पृष्ठभूमि: दैनिक जागरण, मनीकंट्रोल, एशियानेट/एएनआई (अगस्त 2026)।

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