सूरज से निकलने वाले विशाल विस्फोट हमेशा गुब्बारे की तरह बराबर नहीं फैलते, यह बात अब भारत की पहली अंतरिक्ष सौर वेधशाला आदित्य-L1 के डेटा से सामने आई है। बेंगलुरु के भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (IIA) के वैज्ञानिकों ने आदित्य-L1 के मुख्य पेलोड VELC (विज़िबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ) की मदद से दिखाया है कि 5 अगस्त 2024 को सूरज से निकला एक कोरोनल मास इजेक्शन (CME) एक तरफ ज़्यादा और दूसरी तरफ कम फैला, यानी उसका आकार असमान (asymmetric) बन गया। ISRO और PIB ने 3 नवंबर 2026 को यह जानकारी दी।
आदित्य-L1 VELC खोज: मुख्य बातें
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| मिशन | आदित्य-L1 (भारत की पहली अंतरिक्ष सौर वेधशाला) |
| उपकरण | VELC, 7 पेलोड में मुख्य पेलोड |
| घटना | 5 अगस्त 2024 का CME, सूरज के पश्चिमी किनारे के पास से |
| खोज | CME का फैलाव असमान, धुरी झुकी हुई |
| शोध पत्र | The Astrophysical Journal Letters |
| टीम | सौरभ त्रिपाठी, तन्मय सामंत, जयंत जोशी (IIA, बेंगलुरु) |
CME क्या है और यह धरती के लिए क्यों मायने रखता है
कोरोनल मास इजेक्शन यानी CME सूरज के बाहरी वातावरण (कोरोना) से निकलने वाला गर्म, चुंबकीय प्लाज्मा का बहुत बड़ा गुबार होता है। जो CME धरती की तरफ आते हैं, वे अंतरिक्ष मौसम (स्पेस वेदर) में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं और उपग्रहों व संचार व्यवस्था पर असर डाल सकते हैं। इसलिए यह पहले से अंदाज़ा लगाना ज़रूरी है कि कोई CME किस रफ्तार और दिशा में आगे बढ़ेगा।
मुश्किल यह है कि ज़्यादातर कोरोनाग्राफ CME की सिर्फ दो-आयामी (2D) तस्वीर दिखाते हैं। वे आसमान में उसकी आड़ी-तिरछी चाल तो पकड़ लेते हैं, लेकिन यह सीधे नहीं माप पाते कि प्लाज्मा हमारी तरफ आ रहा है या हमसे दूर जा रहा है। यहीं VELC काम आता है।

VELC ने कैसे देखी ‘तीसरी दिशा’
VELC सिर्फ तस्वीर नहीं लेता, बल्कि रोशनी का स्पेक्ट्रम दर्ज करता है। यह कोरोना में अत्यधिक आयनित लोहे से निकलने वाली 530.3 नैनोमीटर की हरी उत्सर्जन रेखा पर नज़र रखता है, जो करीब 18 लाख केल्विन तापमान वाले गर्म प्लाज्मा से आती है। इसमें डॉप्लर स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल होता है, यानी वही सिद्धांत जिस पर ट्रैफिक पुलिस की स्पीड गन काम करती है।
- प्लाज्मा हमारी तरफ आए तो उसकी रोशनी छोटी (नीली) तरंगदैर्घ्य की ओर खिसकती है
- प्लाज्मा दूर जाए तो रोशनी लंबी (लाल) तरंगदैर्घ्य की ओर खिसकती है
- 5 अगस्त 2024 के CME में VELC ने सामान्य रेखा के दोनों तरफ एक साथ नीली और लाल, दो अलग शाखाएं देखीं
इसी दौरान NASA के सोलर डायनैमिक्स ऑब्ज़र्वेटरी (SDO) के AIA उपकरण ने आसमान में CME के फैलाव की तस्वीरें लीं। दोनों डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों को CME की हमारी ओर और हमसे दूर जाने वाली चाल, दोनों का पता चला।
3D मॉडल से हुई पुष्टि
IIA टीम ने फैलते हुए खोल जैसे CME का एक 3D ज्यामितीय-गतिक मॉडल बनाया। बराबर फैलने वाला मॉडल VELC के पैटर्न से मेल नहीं खाया, लेकिन जब मॉडल में झुकी हुई धुरी और असमान पार्श्व फैलाव जोड़ा गया, तो नतीजे VELC के आंकड़ों से काफी मिल गए। IIA के सौर खगोलविद और शोध के संबंधित लेखक तन्मय सामंत ने कहा, “हमारे नतीजे दिखाते हैं कि CME एक समान रूप से नहीं फैला।”

स्पेस वेदर के अनुमान पर क्या असर होगा
अब तक के ज़्यादातर अवलोकन और मॉडल CME को एक सममित (symmetric) बुलबुला मानकर चलते थे। सह-लेखक जयंत जोशी के मुताबिक, शुरुआती CME का असमान आकार यह तय कर सकता है कि वह सौर हवा से कैसे टकराता है और उस पर कितना खिंचाव (drag) पड़ता है। इससे उसकी रफ्तार और आखिर में धरती तक पहुंचने का समय बदल सकता है।
आम तौर पर CME की 3D बनावट समझने के लिए अलग-अलग दिशाओं से देखने वाले कई अंतरिक्ष यानों की ज़रूरत होती है। यह अध्ययन दिखाता है कि VELC अकेले एक जगह से भी, इमेजिंग डेटा के साथ मिलकर, CME की 3D ज्यामिति का अंदाज़ा दे सकता है। शोधकर्ता अब इस तकनीक को दूसरे CME पर भी आज़माएंगे।

आदित्य-L1 और VELC: एक परिचय
आदित्य-L1 को सितंबर 2023 में PSLV-C57 से लॉन्च किया गया था और यह अब सूर्य-पृथ्वी के L1 बिंदु से लगातार सूरज पर नज़र रख रहा है। इसमें 7 पेलोड हैं, जिनमें VELC मुख्य पेलोड है। VELC को IIA ने होसकोटे स्थित अपने CREST परिसर की MGK मेनन स्पेस साइंस लैब में ISRO के सहयोग से डिज़ाइन और तैयार किया। अध्ययन की तस्वीर में VELC का डेटा सूरज के 1.05 से 1.5 सौर त्रिज्या तक के बाहरी हिस्से को दिखाता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
आदित्य-L1 के VELC ने क्या नई खोज की है?
VELC के डेटा से पता चला कि 5 अगस्त 2024 का CME सूरज के पास एक समान बुलबुले की तरह नहीं फैला, बल्कि असमान रूप से फैला और उसकी धुरी झुकी हुई थी।
VELC क्या है?
VELC यानी विज़िबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ आदित्य-L1 का मुख्य पेलोड है। यह 530.3 nm की हरी उत्सर्जन रेखा से कोरोना के गर्म प्लाज्मा की चाल मापता है। इसे IIA बेंगलुरु ने ISRO के सहयोग से बनाया है।
यह खोज धरती के लिए क्यों अहम है?
CME का आकार उसकी रफ्तार और धरती तक पहुंचने के समय पर असर डाल सकता है। इससे उपग्रहों और संचार को प्रभावित करने वाले स्पेस वेदर के बेहतर अनुमान में मदद मिल सकती है।
यह शोध कहां प्रकाशित हुआ?
यह The Astrophysical Journal Letters में छपा है। लेखक सौरभ त्रिपाठी, तन्मय सामंत और जयंत जोशी (IIA, बेंगलुरु) हैं।
स्रोत
- ISRO: India’s Aditya-L1 Reveals the Hidden Third Dimension of a Solar Eruption (3 नवंबर 2026)
- PIB (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय): VELC on board Aditya-L1 reveals asymmetric expansion of solar eruption (3 नवंबर 2026)
- शोध पत्र: The Astrophysical Journal Letters, doi 10.3847/2041-8213/aea295
- तस्वीरें: ISRO और IIA/PIB की आधिकारिक सामग्री








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