फीचर्ड इमेज: नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की इमारत। फोटो: Subhashish Panigrahi / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)
“सुनवाई को आगे बढ़ने दीजिए।” सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस वी. मोहना की इस एक टिप्पणी में मंगलवार का पूरा फैसला समझा जा सकता है। पाटन विधानसभा सीट से 2023 के चुनाव में भूपेश बघेल की जीत को चुनौती देने वाली याचिका में पूर्व मुख्यमंत्री की नई अर्जी को सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर 2026 को खारिज कर दिया। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का 13 अक्टूबर का आदेश बरकरार रहा और दुर्ग से भाजपा सांसद विजय बघेल की चुनाव याचिका पर ट्रायल का रास्ता साफ हो गया।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने की। भूपेश बघेल की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा और दामा शेषाद्रि नायडू पेश हुए। Bar & Bench और PTI की रिपोर्ट के मुताबिक बेंच ने सुनवाई के दौरान कई बार कहा कि इस तरह की अर्जियों से मुकदमा लंबा खिंच रहा है।
अर्जी में मांग क्या थी
भूपेश बघेल चाहते थे कि हाईकोर्ट पूरा ट्रायल शुरू करने से पहले एक बात अलग से तय करे: क्या विजय बघेल की याचिका तय समय सीमा के भीतर दायर हुई थी? जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 के तहत नतीजे के 45 दिन के भीतर चुनाव याचिका दायर करनी होती है। बघेल पक्ष की दलील है कि यह समय सीमा 17 जनवरी 2024 को खत्म हो गई थी, जबकि याचिका के साथ लगा हलफनामा 22 जनवरी 2024 का है।
हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर को यह मांग ठुकरा दी थी। Bar & Bench के मुताबिक हाईकोर्ट ने अपने आदेश में लिखा था, “This Court is not inclined to permit such a separate preliminary adjudication at the present stage”, यानी इस स्टेज पर ऐसे किसी अलग प्रारंभिक फैसले की इजाजत देने का अदालत का इरादा नहीं है। इसी आदेश के खिलाफ बघेल सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

अदालत में किसने क्या कहा
अमर उजाला में छपी PTI-भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक कपिल सिब्बल ने बेंच से कहा, “हमारी दो मांगें हैं। या तो प्रारंभिक मुद्दे पर फैसला लें, या फिर यह न कहें कि कोई मुद्दा ही नहीं है।” उनका कहना था कि हाईकोर्ट ने यह मान लिया है कि समय सीमा का कोई मुद्दा बनता ही नहीं।
इस पर जस्टिस मोहना ने कहा कि समय सीमा तथ्य और कानून, दोनों से जुड़ा मिला-जुला सवाल है और यह बात पहले भी उठाई जा सकती थी। Bar & Bench के अनुसार उन्होंने कहा, “Let the trial proceed. You are delaying as much as possible. You will have a decision.” हिंदी में इसका अर्थ है कि सुनवाई आगे बढ़ने दीजिए, आप जितनी हो सके देरी कर रहे हैं, फैसला तो आएगा ही।
जस्टिस बागची की टिप्पणी और सीधी थी। Bar & Bench के मुताबिक उन्होंने कहा, “This is another aspect of delaying the trial. Once we allow this, then you will pray for amendment. Election cases should have time-bound disposal.” यानी यह ट्रायल में देरी का एक और तरीका है, इसकी इजाजत दी तो अगली मांग संशोधन की होगी, जबकि चुनाव मामलों का निपटारा तय समय में होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि किसी को बघेल को यह सलाह देनी चाहिए थी कि वे अपने लिखित बयान में संशोधन कर लें। सिब्बल ने जवाब में कहा कि बघेल संशोधन की अर्जी दाखिल नहीं करेंगे और इसे रिकॉर्ड पर लिया जाए। इसके बाद CJI ने कहा, “याचिका खारिज की जाती है। हम हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हैं।” रिपोर्ट्स के मुताबिक सिब्बल के अनुरोध पर बेंच ने बघेल पर कोई जुर्माना नहीं लगाया।
विजय बघेल की याचिका में आरोप क्या है
2023 के विधानसभा चुनाव में पाटन सीट पर भूपेश बघेल को 95,438 और भाजपा उम्मीदवार विजय बघेल को 75,715 वोट मिले थे। हार के बाद विजय बघेल ने हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की। उनका आरोप है कि 16 नवंबर 2023 को, यानी मतदान से पहले के 48 घंटे के “साइलेंस पीरियड” में, भूपेश बघेल ने रोड शो किया जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 का उल्लंघन है।
यह अब तक सिर्फ आरोप है, जिसे अदालत ने साबित नहीं माना है। भूपेश बघेल पक्ष इसे गलत बताता रहा है। अगस्त की सुनवाई में सिब्बल ने दलील दी थी कि धारा 126 का उल्लंघन एक चुनावी अपराध है, धारा 123 वाला “भ्रष्ट आचरण” नहीं। LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा था कि उस रोड शो में करीब 200 लोग थे और बघेल को Z+ सुरक्षा मिली हुई थी। दूसरी तरफ विजय बघेल का कहना है कि इस उल्लंघन से नतीजे पर असर पड़ा। यही सवाल अब ट्रायल में तय होगा।

ढाई साल की कानूनी खींचतान, एक नजर में
- जनवरी 2024: विजय बघेल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की।
- जुलाई 2025: भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी पिछली चुनौती वापस ली और याचिका की वैधता पर आपत्तियां हाईकोर्ट में उठाने की छूट ली।
- जून 2026: हाईकोर्ट ने याचिका को शुरुआत में ही खारिज करने की उनकी अर्जी ठुकरा दी।
- 7 अगस्त 2026: सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका को सीधे खारिज करने से इनकार किया और कहा कि सारी दलीलें ट्रायल में रखी जा सकती हैं।
- 28 सितंबर 2026: समय सीमा वाले मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार किया, हालांकि संकेत दिया कि हाईकोर्ट कानून के मुताबिक इस पर विचार कर सकता है।
- 13 अक्टूबर 2026: हाईकोर्ट ने समय सीमा को अलग प्रारंभिक मुद्दे के तौर पर तय करने से इनकार किया।
- 3 नवंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश बरकरार रखा।
अगस्त वाली सुनवाई में भी जस्टिस बागची ने कहा था कि रोड शो से नतीजा प्रभावित हुआ या नहीं, यह तथ्य का सवाल है जिसे सबूतों से ही तय किया जा सकता है। लल्लूराम की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यह भी कहा था, “आपके पास बचाव के लिए एक तर्कसंगत मामला है।” यानी अदालत ने बघेल के बचाव को कमजोर नहीं बताया, बस यह कहा कि उसे ट्रायल में साबित करना होगा।
चाचा-भतीजे की पुरानी सियासी टक्कर
पाटन की लड़ाई सिर्फ अदालती नहीं है। भूपेश बघेल और विजय बघेल दुर्ग जिले की इस सीट पर कई बार आमने-सामने आ चुके हैं और दोनों के बीच पारिवारिक रिश्ता भी है, विजय रिश्ते में भूपेश के भतीजे लगते हैं। 2008 में विजय बघेल ने पाटन में भूपेश को हराया था, जबकि 2013 में भूपेश ने यह सीट वापस जीत ली। 2018 में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद भूपेश मुख्यमंत्री बने और 2023 तक इस पद पर रहे। विजय बघेल 2019 में दुर्ग से लोकसभा पहुंचे थे और आज भी दुर्ग के सांसद हैं।
2023 में भाजपा ने सांसद रहते हुए विजय बघेल को पाटन से उतारा था। राज्य में भाजपा जीती, लेकिन पाटन में भूपेश बघेल करीब 19,700 वोटों से जीत गए। उसी हार के बाद से यह याचिका चल रही है।

किसकी तरफ से क्या प्रतिक्रिया आई
इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक भूपेश बघेल, विजय बघेल, कांग्रेस या भाजपा की ओर से आज के आदेश पर कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। भूपेश बघेल के आधिकारिक X हैंडल पर मंगलवार को चुनाव आयोग और SIR से जुड़े पोस्ट दिखे, लेकिन इस फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं थी। दोनों पक्षों के जवाब का इंतज़ार है। मिलते ही यह खबर अपडेट की जाएगी।
पिछली बार, 7 अगस्त के आदेश के बाद, भाजपा विधि प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक बृजेश पांडेय ने इसे भूपेश बघेल की “नैतिक हार” बताया था।
विश्लेषण: अदालत का संदेश और कांग्रेस की मुश्किल
मंगलवार के आदेश से भूपेश बघेल की विधायकी पर कोई सीधा फैसला नहीं हुआ है। अदालत ने सिर्फ इतना कहा है कि समय सीमा समेत सारे सवाल पूरे ट्रायल में एक साथ तय होंगे। लेकिन तीन जजों की बेंच की टिप्पणियां, खासकर “देरी” वाली बात, बघेल खेमे के लिए असहज हैं। इससे भाजपा को यह कहने का मौका मिलता है कि पूर्व मुख्यमंत्री सुनवाई से बच रहे हैं।
दूसरी तरफ कानूनी नजरिए से बघेल की मुख्य दलील अभी खत्म नहीं हुई है। समय सीमा और धारा 126 बनाम धारा 123 का सवाल ट्रायल में फिर उठेगा। चुनाव याचिका में किसी उम्मीदवार का चुनाव तभी रद्द होता है जब कानून में तय आधार सबूतों से साबित हों। इसलिए अंतिम नतीजा सबूतों और गवाहियों पर टिका है, न कि सुनवाई के दौरान की टिप्पणियों पर।
सियासी समय भी अहम है। भूपेश बघेल इन दिनों चुनाव आयोग के खिलाफ कांग्रेस के अभियान का बड़ा चेहरा हैं और महादेव ऐप केस को लेकर भाजपा के निशाने पर भी हैं। ऐसे में पाटन का मुकदमा अगले कुछ महीनों तक छत्तीसगढ़ की राजनीति में चर्चा का विषय बना रहेगा।
आगे क्या होगा
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में विजय बघेल की चुनाव याचिका पर ट्रायल आगे बढ़ेगा, जिसमें गवाहियां और सबूत पेश होंगे।
- समय सीमा का मुद्दा अलग से नहीं, बल्कि अंतिम फैसले के साथ तय होगा।
- सिब्बल के बयान के बाद बघेल अपने लिखित बयान में संशोधन की अर्जी नहीं देंगे, यह बात रिकॉर्ड पर है।
- बेंच की टिप्पणी के बाद उम्मीद है कि हाईकोर्ट सुनवाई में तेजी लाएगा, क्योंकि अगला विधानसभा चुनाव 2028 के आखिर में होना है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या भूपेश बघेल की विधायकी चली गई है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ उनकी एक अर्जी खारिज की है। उनकी सदस्यता पर फैसला हाईकोर्ट में ट्रायल पूरा होने के बाद ही होगा।
विजय बघेल कौन हैं?
विजय बघेल भाजपा के नेता और दुर्ग लोकसभा सीट से सांसद हैं। वे पाटन से विधायक और संसदीय सचिव रह चुके हैं। 2023 में उन्होंने पाटन से भूपेश बघेल के खिलाफ चुनाव लड़ा था।
धारा 126 क्या कहती है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 मतदान खत्म होने से पहले के 48 घंटों में सार्वजनिक सभा, जुलूस और चुनाव प्रचार पर रोक लगाती है।
यह भी पढ़ें: महादेव ऐप केस में सौरभ चंद्राकर की रिमांड पर CM साय और भूपेश बघेल के बयान
इस खबर के स्रोत और संदर्भ
- Bar & Bench (देबायन रॉय), 3 नवंबर 2026: सुनवाई की टिप्पणियां और हाईकोर्ट का आदेश
- India Today / PTI, 3 नवंबर 2026
- अमर उजाला (PTI-भाषा), 3 नवंबर 2026
- टाइम्स नाउ नवभारत और TV9 भारतवर्ष, 3 नवंबर 2026
- Verdictum, 3 नवंबर 2026
- पृष्ठभूमि: LiveLaw और लल्लूराम (7 अगस्त 2026), India Today (28 सितंबर 2026)
नोट: तस्वीरें Wikimedia Commons और सांसद विजय बघेल (@vijaybaghelcg) के आधिकारिक X हैंडल से ली गई हैं; हर तस्वीर के नीचे उसका स्रोत दिया गया है। याचिका में लगाए गए आरोप याचिकाकर्ता के हैं, जिन पर अदालत का फैसला आना बाकी है।








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