मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच चल रही लड़ाई अब एक राज्य विधानसभा के रिकॉर्ड तक पहुंच गई है। पंजाब विधानसभा ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर को एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में हुई चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक यह पहली बार है जब किसी राज्य विधानसभा ने इस तरह का प्रस्ताव पास किया है। प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ। उस समय कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के विधायक सदन में मौजूद नहीं थे, जबकि अकाली दल के दो बागी विधायक, बसपा विधायक और एक निर्दलीय विधायक मौजूद रहे।
प्रस्ताव में असल में लिखा क्या है
टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट में प्रस्ताव का हिंदी पाठ पढ़ा गया। उसके मुख्य हिस्से इस तरह हैं:
यह सदन मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों से संबंधित कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच तंत्र स्थापित करने की मांग करता है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जवाबदेही तय की जा सके।
पंजाब विधानसभा का प्रस्ताव, 23 अक्टूबर 2026 (टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट में पढ़ा गया पाठ)
प्रस्ताव में तीन और बातें हैं। पहली, नागरिकों को कथित तौर पर मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने पर ‘गहरी चिंता’ जताई गई है। दूसरी, यह मांग की गई है कि जांच में किसी के खिलाफ आपराधिक उल्लंघन के ठोस सबूत मिलें, तो कानून के मुताबिक आपराधिक कार्यवाही शुरू हो। तीसरी, केंद्र सरकार और संवैधानिक पदाधिकारियों से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और जवाबदेही बनाए रखने की अपील करते हुए प्रस्ताव की कॉपी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजने की बात कही गई है।
वीडियो स्रोत: Times Now Navbharat (YouTube) | मूल वीडियो देखें
मान सरकार के आरोप
सदन में बहस के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा (अंग्रेज़ी रिपोर्ट से अनुवाद) कि पहले लोग सरकार चुनते थे, अब सरकार तय कर रही है कि कौन वोट देगा और किसके वोट काटे जाएंगे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मान ने नई दिल्ली विधानसभा सीट पर करीब 40,000 नाम हटाए जाने का उदाहरण दिया और विपक्षी नेताओं के खिलाफ ED और CBI के इस्तेमाल का आरोप भी लगाया। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने आरोप लगाया कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने BLO के साथ मिलकर फर्ज़ी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया। आप विधायक इंदरजीत कौर मान ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग रखी।
ध्यान रहे कि ये सभी आरोप हैं। इनकी किसी स्वतंत्र एजेंसी ने अब तक पुष्टि नहीं की है। प्रस्ताव पर चुनाव आयोग या ज्ञानेश कुमार की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया हमें उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिली; आयोग के जवाब का इंतज़ार है।
भाजपा का पलटवार: ‘SIR तो आपके अफसरों ने कराया’
पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने PTI से बातचीत में मान सरकार पर सवाल उठाए। उनका तर्क है कि पंजाब में SIR राज्य के अपने अधिकारियों ने कराया, और अगर किसी का नाम गलत तरीके से कटा है तो सरकार एक भी ऐसा मतदाता सामने लाकर दिखाए। उन्होंने यह भी कहा कि आप नेताओं ने ही पहले चुनाव आयोग को बताया था कि प्रक्रिया ठीक चल रही है।
टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा ने 50 वार्डों के नगर निगम चुनाव से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर भी आप सरकार को घेरा। भाजपा नेताओं ने वीडियो में कहा कि EVM और SIR का मुद्दा 2027 में होने वाली हार को पहले से स्वीकार करने जैसा है। पंजाब में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं, यानी चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं।
क्या विधानसभा का प्रस्ताव CEC पर कोई असर डाल सकता है
सीधा जवाब है: कानूनी तौर पर नहीं। राज्य विधानसभा का ऐसा प्रस्ताव केंद्र या किसी संवैधानिक संस्था पर बाध्यकारी नहीं होता। यह सदन की राय दर्ज करने का तरीका है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से। किसी राज्य विधानसभा की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
तो फिर इस प्रस्ताव का मतलब क्या है? इसका असर राजनीतिक है। पहली बार किसी चुनी हुई विधानसभा ने आधिकारिक रिकॉर्ड पर CEC के कार्यकाल पर सवाल उठाया है। इससे विपक्ष को यह कहने का आधार मिलता है कि आरोप सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस या सड़क तक सीमित नहीं हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दलों कांग्रेस और अकाली दल का सदन में मौजूद न होना यह भी दिखाता है कि पंजाब में SIR का मुद्दा आम आदमी पार्टी के लिए अपनी अलग राजनीतिक ज़मीन बनाने का ज़रिया भी है।
राष्ट्रीय तस्वीर में यह प्रस्ताव कहां बैठता है
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब INDIA गठबंधन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपनी मुहिम तेज़ कर रहा है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक गठबंधन 28 अक्टूबर को CEC के खिलाफ ‘मॉक इम्पीचमेंट’ की योजना बना रहा है, और नेशनल हेराल्ड के मुताबिक 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली प्रस्तावित है। इससे पहले विपक्षी सांसदों का चुनाव आयोग तक मार्च पुलिस ने रोक दिया था।
पंजाब का यह विशेष सत्र 22 से 27 अक्टूबर तक चल रहा है, और पहले दिन से ही गरमाया हुआ है। इसी सत्र में कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा का निलंबन भी सुर्खियों में रहा।
आगे के तीन सवाल
- क्या दूसरे विपक्ष-शासित राज्य, जैसे कर्नाटक, तेलंगाना, केरल या पश्चिम बंगाल, भी ऐसे प्रस्ताव लाएंगे? अगर हां, तो यह मुद्दा संघीय ढांचे की बहस में बदल सकता है।
- क्या चुनाव आयोग इस प्रस्ताव का औपचारिक जवाब देगा, या इसे राजनीतिक बयान मानकर नज़रअंदाज़ करेगा?
- भाजपा की चुनौती, यानी ‘एक भी गलत तरीके से कटा नाम दिखाइए’, का पंजाब सरकार ठोस आंकड़ों से जवाब देती है या नहीं। 2027 के चुनाव से पहले यही सबसे अहम परीक्षा होगी।
फिलहाल इतना साफ है कि SIR की बहस अब तकनीकी प्रक्रिया से निकलकर पूरी तरह चुनावी मुद्दा बन चुकी है, और पंजाब ने इसमें एक नया अध्याय जोड़ दिया है।
इस रिपोर्ट के तथ्य और बयान इन मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं: द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस, PTI, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, नेशनल हेराल्ड, Times Now Navbharat (YouTube)।

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